Mandi, Dharamveer-:मंडी जिले की बल्ह घाटी के गांव राजगढ़ निवासी कृषि वैज्ञानिक नरेंद्र पाल ठाकुर ने फसलों और बागीचों को बंदरों व जंगली जानवरों से बचाने के लिए एक सस्ती, टिकाऊ और पर्यावरण के अनुकूल तकनीक विकसित की है। यह शोध उन्होंने जम्मू स्थित शेर-ए-कश्मीर कृषि विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी विश्वविद्यालय (स्कौस्ट) में अपनी सेवाकाल के दौरान किया था, जिसे आज जम्मू-कश्मीर के सैकड़ों किसान और बागवान सफलतापूर्वक अपना रहे हैं।
बीते अगस्त माह में सेवानिवृत्त होकर अपने पैतृक गांव लौटे नरेंद्र पाल ठाकुर अब इस तकनीक को मंडी जिले सहित पूरे हिमाचल प्रदेश के किसानों तक पहुंचाने के लिए प्रयासरत हैं। हिमाचल में बंदरों और जंगली जानवरों की बढ़ती समस्या के कारण किसान लगातार अपनी फसलों को होने वाले नुकसान से परेशान हैं। ऐसे में यह तकनीक उनके लिए एक स्थायी समाधान साबित हो सकती है।
किसानों को मिलेगा दोहरा लाभ
नरेंद्र पाल ठाकुर ने बताया कि अब तक फसलों की सुरक्षा के लिए जो उपाय अपनाए जा रहे हैं, वे या तो काफी महंगे हैं या फिर पर्यावरण को नुकसान पहुंचाते हैं। इसके विपरीत उनकी विकसित की गई तकनीक न केवल कम लागत वाली है, बल्कि पूरी तरह से पर्यावरण मित्र भी है। खास बात यह है कि इससे किसानों को केवल फसल सुरक्षा ही नहीं, बल्कि अतिरिक्त आमदनी का भी अवसर मिलता है।इस तकनीक का आधार करौंदा नामक कांटेदार पौधा है। किसानों और बागवानों को अपने खेतों या बागीचों की मेड़ पर इसकी बाड़ लगानी होती है। यह पौधा लगभग एक वर्ष में तैयार हो जाता है और दूसरे वर्ष से फल देना शुरू कर देता है। करौंदा पौधा हिमाचल में पाए जाने वाले खरनू, खरणू या गरनू पौधे के समान है, जिसकी कांटेदार संरचना बंदरों और अन्य जंगली जानवरों को खेतों में प्रवेश करने से रोकती है।
करौंदा के फल औषधीय गुणों से भरपूर होते हैं और इनमें विटामिन-सी प्रचुर मात्रा में पाया जाता है। स्वाद में खट्टे-मीठे ये फल अचार, जैम और जैली बनाने के लिए बेहद उपयुक्त हैं, जिससे किसान अतिरिक्त आय अर्जित कर सकते हैं।
नरेंद्र पाल ठाकुर का कहना है कि चूंकि जम्मू-कश्मीर और हिमाचल प्रदेश की जलवायु काफी हद तक समान है, इसलिए यह पौधा यहां आसानी से उगाया जा सकता है। आने वाले समय में वे अपने क्षेत्र में किसानों के साथ मिलकर इसके प्रयोगात्मक मॉडल तैयार करेंगे और पौधों की उपलब्धता सुनिश्चित करने का भी प्रयास करेंगे।