करनाल। जिले में कस्टम मिलिंग राइस (सीएमआर) योजना के तहत बड़ा घोटाला सामने आया है। आरोप है कि 58 राइस मिलरों ने पिछले करीब 12 वर्षों से सरकार को करीब 308 करोड़ रुपये का चूना लगाया है। हैरानी की बात यह है कि इतने लंबे समय तक डीएफएससी (खाद्य एवं आपूर्ति विभाग) और संबंधित अधिकारी मूकदर्शक बने रहे, जिससे सरकारी धन की रिकवरी आज तक नहीं हो सकी।
जानकारी के अनुसार सीएमआर योजना के तहत सरकार राइस मिलरों को धान आवंटित करती है और मिलिंग खर्च भी वहन करती है। इसके बदले मिलरों को आवंटित धान से तैयार 67 प्रतिशत चावल तय समय-सीमा में सरकार को लौटाना होता है। लेकिन करनाल के इन 58 राइस मिलरों ने सरकार से धान तो उठा लिया, पर चावल वापस नहीं किया, जिससे सैकड़ों करोड़ रुपये के सरकारी धन का गबन हो गया।
रिकवरी को लेकर विभागीय लापरवाही भी सवालों के घेरे में है। बताया जा रहा है कि डीएफएससी और राजस्व विभाग डिफॉल्टर राइस मिलरों की सूची सार्वजनिक करने से बचते रहे हैं। हालांकि डीएफएससी करनाल के अधिकारी मुकेश कुमार का कहना है कि डिफॉल्टर मिलरों से रिकवरी के लिए टीम गठित की गई है, लेकिन फिलहाल राइस मिलरों की सूची साझा नहीं की जा सकती।
वहीं राजस्व अधिकारी राकेश मित्तल ने बताया कि डिफॉल्टर राइस मिलरों की सूची डीएफएससी विभाग द्वारा उपलब्ध कराई गई है और उसी के आधार पर रिकवरी की प्रक्रिया चल रही है। इसके बावजूद अब तक बड़ी रकम की वसूली नहीं हो सकी है।
नाम बदलकर फिर योजना का लाभ लेने का आरोप
सूत्रों के मुताबिक कई डिफॉल्टर राइस मिलर बकाया होने के बावजूद रिश्तेदारों के नाम से नई फर्म बनाकर दोबारा सीएमआर योजना का लाभ ले लेते हैं। अधिकारियों से कथित सांठगांठ के चलते उन्हें फिर से धान आवंटित हो जाता है, जिससे हर साल सरकारी खजाने को करोड़ों रुपये का नुकसान उठाना पड़ता है और यह सिलसिला थम नहीं पा रहा है।
विभाग पर पहले भी लगे हैं भ्रष्टाचार के आरोप
डीएफएससी विभाग पहले भी भ्रष्टाचार के आरोपों में घिर चुका है। पूर्व में डीएफएससी अधिकारी अनिल कुमार भ्रष्टाचार के मामले में जेल जा चुके हैं। गुरुग्राम में एक डिपो होल्डर ने उन पर महंगी एप्पल घड़ी और आईफोन 15 लेने के आरोप लगाए थे, जिस पर विजिलेंस गुरुग्राम ने अनिल कुमार सहित अन्य अधिकारियों और कर्मचारियों के खिलाफ मामला दर्ज किया था।
पूरे मामले ने सीएमआर योजना की पारदर्शिता और विभागीय निगरानी व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं, वहीं करोड़ों रुपये की रिकवरी अब भी प्रशासन के लिए बड़ी चुनौती बनी हुई है।