Summer express, नई दिल्ली | भीषण गर्मी अब भारत के लिए सिर्फ मौसम की चुनौती नहीं रह गई है, बल्कि यह धीरे-धीरे एक गंभीर आर्थिक संकट का रूप लेती जा रही है। देश के कई राज्यों—हरियाणा, पंजाब, दिल्ली-एनसीआर, राजस्थान, बिहार, महाराष्ट्र के विदर्भ, छत्तीसगढ़ और झारखंड—में लू को लेकर मौसम विभाग ने अलर्ट जारी किया है। विशेषज्ञों का कहना है कि बढ़ता तापमान न केवल जनजीवन को प्रभावित कर रहा है, बल्कि देश की आर्थिक रफ्तार को भी धीमा कर सकता है।
अर्थशास्त्रियों और स्वास्थ्य विशेषज्ञों के अनुसार, अत्यधिक गर्मी के कारण कार्यक्षमता में भारी गिरावट दर्ज की जा रही है। रिपोर्टों के मुताबिक, भारत को अब तक गर्मी के कारण करीब 159 अरब डॉलर तक का उत्पादकता नुकसान हो चुका है, जो देश की कुल आय का लगभग 5.4 प्रतिशत माना जा रहा है। हर साल करीब 160 अरब से अधिक कामकाजी घंटे प्रभावित होते हैं, क्योंकि मजदूरों को चरम तापमान में काम रोकना पड़ता है या उनकी कार्य क्षमता कम हो जाती है।
विशेषज्ञों का अनुमान है कि यदि स्थिति पर नियंत्रण के लिए प्रभावी कदम नहीं उठाए गए, तो इस दशक के अंत तक भारत की GDP में 2.5 से 4.5 प्रतिशत तक की गिरावट देखी जा सकती है। कुछ अध्ययनों में यह भी चेतावनी दी गई है कि सदी के मध्य तक यह नुकसान 8 प्रतिशत से अधिक तक पहुंच सकता है।
गर्मी का असर सबसे ज्यादा कृषि, निर्माण क्षेत्र और असंगठित श्रमिकों पर पड़ रहा है। खेतों और खुले क्षेत्रों में काम करने वाले मजदूरों की आय पर सीधा असर देखने को मिल रहा है। इसके साथ ही, खाद्य उत्पादन में गिरावट की आशंका भी जताई जा रही है, जिससे बाजार में कीमतें बढ़ सकती हैं और महंगाई पर दबाव और अधिक बढ़ सकता है।
स्वास्थ्य विशेषज्ञों के अनुसार, हीटस्ट्रोक और गर्मी से जुड़ी बीमारियों का इलाज भी बेहद महंगा साबित हो रहा है। गंभीर मामलों में एक मरीज पर 1 से 2 लाख रुपये तक का खर्च आ सकता है, जिससे मध्यम और गरीब परिवारों पर आर्थिक बोझ बढ़ रहा है। कई परिवार इलाज के लिए कर्ज लेने या संपत्ति बेचने तक को मजबूर हो रहे हैं।
कृषि विशेषज्ञों का कहना है कि बढ़ता तापमान चावल और अन्य प्रमुख फसलों की पैदावार को भी प्रभावित कर सकता है, जिससे खाद्य सुरक्षा पर खतरा मंडराने लगा है। इसके चलते ग्रामीण अर्थव्यवस्था पर भी नकारात्मक प्रभाव पड़ रहा है।
विशेषज्ञों ने सुझाव दिया है कि सरकार को हीट एक्शन प्लान, कूलिंग इंफ्रास्ट्रक्चर, श्रमिक सुरक्षा और स्वास्थ्य बीमा जैसी नीतियों को और मजबूत करने की जरूरत है, ताकि लू की इस बढ़ती चुनौती को केवल मौसमी समस्या नहीं बल्कि एक गंभीर आर्थिक खतरे के रूप में नियंत्रित किया जा सके।