Summer express/शिमला, संजू -:महिला आरक्षण को लेकर प्रदेश की राजनीति एक बार फिर गरमा गई है। महिला आरक्षण बिल के मुद्दे पर भारतीय जनता पार्टी द्वारा सड़कों पर उतरकर विरोध प्रदर्शन और रैलियां करने के बाद अब कांग्रेस ने पलटवार किया है। उद्योग मंत्री हर्षवर्धन चौहान ने भाजपा के रुख को “नौटंकी और ड्रामा” करार देते हुए उसके इरादों पर सवाल खड़े किए हैं।
हाल ही में शिमला में भाजपा द्वारा आक्रोश रैली निकाली गई, जिसमें कांग्रेस पर महिलाओं के साथ विश्वासघात करने के आरोप लगाए गए। इस पर प्रतिक्रिया देते हुए हर्षवर्धन चौहान ने कहा कि भाजपा खुद को महिलाओं की सबसे बड़ी हितैषी दिखाने की कोशिश कर रही है, जबकि हकीकत इससे अलग है। उन्होंने सवाल उठाया कि यदि भाजपा वास्तव में महिलाओं के हितों के प्रति गंभीर होती, तो अपने 46 साल के इतिहास में एक भी महिला को राष्ट्रीय अध्यक्ष क्यों नहीं बनाया गया।चौहान ने कहा कि महिला आरक्षण बिल को सबसे पहले 1997 में कांग्रेस सरकार द्वारा लोकसभा में पेश किया गया था, जिसका उस समय भाजपा ने विरोध किया था। उन्होंने यह भी कहा कि 2023 में जब यह बिल दोबारा लाया गया, तो सभी दलों ने इसे सर्वसम्मति से पास किया, लेकिन इसे तत्काल लागू नहीं किया गया और 2029 के लोकसभा चुनाव तक टाल दिया गया।
उनके अनुसार, भाजपा ने आगामी चुनावों को देखते हुए इस मुद्दे को फिर से उठाया है और डीलिमिटेशन व सीटों में बढ़ोतरी जैसे विषयों को जोड़कर इसे राजनीतिक रंग देने की कोशिश की है। चौहान ने आरोप लगाया कि भाजपा को पहले से ही पता था कि इस बिल को पास कराने के लिए दो-तिहाई बहुमत की जरूरत होती है, जो उसके पास नहीं है, बावजूद इसके वह इसे चुनावी फायदे के लिए इस्तेमाल कर रही है।उन्होंने यह भी कहा कि शिमला में हुए भाजपा के प्रदर्शन में पहली बार महिलाओं को मंच पर प्रमुखता दी गई, जो पहले कभी देखने को नहीं मिला। उनके मुताबिक, यह केवल सहानुभूति हासिल करने की कोशिश है, न कि महिलाओं को वास्तविक अधिकार देने की मंशा।
चौहान ने कांग्रेस का पक्ष रखते हुए कहा कि हिमाचल प्रदेश में कांग्रेस ने तीन महिलाओं को प्रदेश अध्यक्ष बनाया है, जबकि भाजपा ने दशकों में ऐसा कोई कदम नहीं उठाया। उन्होंने भाजपा से सवाल किया कि यदि वह महिलाओं की इतनी बड़ी समर्थक है, तो उन्हें पार्टी के उच्च पदों पर स्थान क्यों नहीं दिया जाता।उन्होंने निष्कर्ष में कहा कि भाजपा का पूरा अभियान केवल चुनावी रणनीति का हिस्सा है और इसका उद्देश्य महिलाओं को सशक्त बनाना नहीं, बल्कि राजनीतिक लाभ हासिल करना है।