Summer express, नई दिल्ली। दुनिया भर में हाई नेट-वर्थ व्यक्तियों (HNWIs) के एक देश से दूसरे देश में बसने का चलन तेजी से बढ़ रहा है। Henley Wealth Migration Report 2026 के मुताबिक, इस वर्ष करीब 1.65 लाख करोड़पति अपने मूल देशों को छोड़कर विदेशों में बसने की तैयारी कर रहे हैं। यह आंकड़ा पिछले साल की तुलना में उल्लेखनीय रूप से अधिक है और वैश्विक वेल्थ माइग्रेशन के बढ़ते रुझान को दर्शाता है।
रिपोर्ट के अनुसार, राजनीतिक अनिश्चितता, बदलती कर नीतियां, आर्थिक चुनौतियां और बेहतर जीवनशैली की चाह ऐसे प्रमुख कारण हैं, जिनकी वजह से संपन्न लोग नए देशों की ओर रुख कर रहे हैं। पहले जहां लंदन, पेरिस और न्यूयॉर्क जैसे महानगर अमीरों की पहली पसंद हुआ करते थे, वहीं अब कम टैक्स और निवेश के बेहतर अवसर प्रदान करने वाले देशों की मांग बढ़ रही है।
संयुक्त अरब अमीरात (UAE) इस सूची में शीर्ष स्थान पर बना हुआ है। खासतौर पर दुबई का गोल्डन वीजा कार्यक्रम, शून्य आयकर नीति, विश्वस्तरीय सुविधाएं और व्यापार-अनुकूल माहौल दुनियाभर के करोड़पतियों को आकर्षित कर रहा है। इसी वजह से UAE वैश्विक स्तर पर सबसे बड़ा वेल्थ माइग्रेशन हब बनकर उभरा है।
एशिया में सिंगापुर दूसरी सबसे पसंदीदा मंजिल के रूप में सामने आया है। मजबूत अर्थव्यवस्था, पारदर्शी प्रशासन, सुरक्षित बैंकिंग व्यवस्था और निवेश के अनुकूल वातावरण इसे धनी निवेशकों और उद्यमियों के लिए आकर्षक बनाते हैं। भारत, चीन और अन्य एशियाई देशों के कई संपन्न परिवार भी सिंगापुर को नया ठिकाना बना रहे हैं।
रिपोर्ट के अनुसार, करोड़पतियों को आकर्षित करने वाले शीर्ष पांच देशों में UAE, सिंगापुर, अमेरिका, ऑस्ट्रेलिया और स्विट्जरलैंड शामिल हैं। इन देशों में आर्थिक स्थिरता, निवेश के अवसर और उच्च जीवन स्तर प्रमुख आकर्षण हैं।
विशेषज्ञों का मानना है कि जिन देशों से बड़ी संख्या में संपन्न लोग पलायन कर रहे हैं, उन्हें आर्थिक चुनौतियों का सामना करना पड़ सकता है। इससे निवेश, कर संग्रह और रोजगार सृजन पर असर पड़ने की आशंका रहती है। यही कारण है कि कई देश अब अपनी आर्थिक और कर नीतियों की समीक्षा कर रहे हैं ताकि पूंजी और निवेशकों के पलायन को रोका जा सके।