Summer express/यमुनानगर/ परवेज खान -:रासायनिक खेती के बढ़ते खर्च और मिट्टी की घटती उर्वरता के बीच हरियाणा के प्रगतिशील किसान गुरनाम सिंह ने प्राकृतिक खेती को अपनाकर एक नई दिशा दिखाई है। पिछले पांच वर्षों से वे पूरी तरह जैविक तरीके से खेती कर रहे हैं और कम लागत में बेहतर उत्पादन के साथ अच्छी आय अर्जित कर रहे हैं। उनकी यह पहल न केवल किसानों के लिए प्रेरणादायक है, बल्कि पर्यावरण संरक्षण और लोगों को सुरक्षित खाद्यान्न उपलब्ध कराने की दिशा में भी महत्वपूर्ण कदम मानी जा रही है।
करीब तीन एकड़ भूमि पर गुरनाम सिंह बिना रासायनिक उर्वरकों और जहरीले कीटनाशकों के खेती कर रहे हैं। उनके खेतों में गेंदे के फूल, अरबी और गन्ने जैसी फसलें लहलहा रही हैं, जो यह साबित करती हैं कि प्राकृतिक संसाधनों का सही उपयोग कर खेती को लाभदायक बनाया जा सकता है। उनका कहना है कि जैविक खेती से फसलों की गुणवत्ता में उल्लेखनीय सुधार हुआ है और बाजार में उनकी उपज की मांग भी लगातार बढ़ रही है।गुरनाम सिंह अपने खेत के लिए जैविक खाद स्वयं तैयार करते हैं। वे गाय के गोबर, गोमूत्र और अन्य प्राकृतिक सामग्री का उपयोग कर खाद बनाते हैं, जिससे मिट्टी की उर्वरता बनी रहती है और रासायनिक खाद पर निर्भरता लगभग समाप्त हो जाती है। उनका मानना है कि प्राकृतिक खेती केवल किसानों की लागत कम नहीं करती, बल्कि लोगों के स्वास्थ्य और पर्यावरण की सुरक्षा में भी अहम भूमिका निभाती है।वे बताते हैं कि हरियाणा सरकार द्वारा समय-समय पर प्राकृतिक खेती को बढ़ावा देने के लिए प्रशिक्षण, तकनीकी मार्गदर्शन और विभिन्न योजनाओं के तहत सहायता उपलब्ध कराई जाती है। इसके अलावा कृषि उपकरणों और कई फसलों पर मिलने वाली सब्सिडी से भी उन्हें खेती को आधुनिक और लाभकारी बनाने में मदद मिली है।
गुरनाम सिंह का मानना है कि यदि अधिक किसान प्राकृतिक खेती की ओर कदम बढ़ाएं तो खेती का खर्च कम होगा, मिट्टी की सेहत सुधरेगी और उपभोक्ताओं को रसायन-मुक्त खाद्यान्न मिल सकेगा। उनकी सफलता यह संदेश देती है कि सही तकनीक, मेहनत और धैर्य के साथ जैविक खेती भी आर्थिक रूप से उतनी ही लाभदायक हो सकती है, जितनी पारंपरिक रासायनिक खेती। आज उनकी यह पहल अन्य किसानों के लिए प्रेरणा बनकर उभर रही है।