Summer express, मोनिका रावत, चंडीगढ़। पंजाब एवं हरियाणा हाई कोर्ट ने महत्वपूर्ण फैसला सुनाते हुए स्पष्ट किया है कि किसी व्यक्ति द्वारा दिए गए कर्ज की वापसी के लिए बार-बार मांग करना मात्र उसका वैध अधिकार है। इसे अपने-आप आत्महत्या के लिए मजबूर करना (अबेटमेंट आफ सुसाइड) नहीं माना जा सकता। अदालत ने कहा कि भारतीय दंड संहिता की धारा 306 के तहत अपराध तभी बनता है, जब आरोपी की ओर से प्रत्यक्ष उकसावा, जानबूझकर सहायता या ऐसा निकटवर्ती कृत्य हो, जिसने मृतक को आत्महत्या के लिए विवश कर दिया हो। जस्टिस मनीषा बत्रा ने कुलवीर सिंह उर्फ कुलबीर सिंह व एक अन्य द्वारा दायर याचिका स्वीकार करते हुए उनके खिलाफ दर्ज एफआईआर और उससे संबंधित सभी आपराधिक कार्यवाहियों को रद्द कर दिया।
मामला 25 सितंबर 2016 को जालंधर जिले के भोगपुर थाने में दर्ज एफआईआर से जुड़ा था। शिकायत के अनुसार अनिल अग्रवाल, उनकी पत्नी और दोनों बच्चों ने सामूहिक आत्महत्या कर ली थी। घटनास्थल से मिले सुसाइड नोट में आठ लोगों के नाम लिखे गए थे। आरोप था कि मृतक ने उनसे उधार लिया था और मूलधन व ब्याज लौटाने के बावजूद आरोपी लगातार पैसे मांगते, परेशान करते तथा पत्नी और बेटी को उठा ले जाने की धमकी देते थे, जिससे पूरा परिवार आत्महत्या के लिए मजबूर हुआ।जांच के दौरान गठित विशेष जांच दल (एसआईटी) ने सभी संबंधित लोगों के बयान दर्ज किए। शिकायतकर्ता ने एसआईटी के समक्ष कहा कि उसे आत्महत्या के वास्तविक कारण की जानकारी नहीं है और वह मामले को आगे नहीं बढ़ाना चाहती। एसआईटी ने पांच आरोपितों को निर्दोष मानते हुए उनके खिलाफ कार्रवाई रद्द करने की सिफारिश की, जबकि याचिकाकर्ताओं के खिलाफ पूरक चालान पेश किया गया।
हाई कोर्ट ने कहा कि एफआईआर और सुसाइड नोट में लगाए गए आरोपों से यह नहीं दिखता कि याचिकाकर्ताओं ने कोई ऐसा प्रत्यक्ष या जानबूझकर किया गया कृत्य किया, जिससे मृतक के पास आत्महत्या के अलावा कोई विकल्प नहीं बचा हो। अदालत ने टिप्पणी की कि “सुसाइड नोट केवल मुख्य पीड़ित की पीड़ा और व्यथा को व्यक्त करता है। इससे यह बिल्कुल भी प्रतीत नहीं होता कि आरोपितों की कोई ऐसी मंशा थी कि मृतक आत्महत्या कर ले।” अदालत ने सुप्रीम कोर्ट के एक फैसले का भी हवाला दिया, जिसमें कहा गया था कि कर्जदाता द्वारा बार-बार भुगतान मांगना उसके वैध अधिकार का प्रयोग है और केवल इसी आधार पर धारा 306 का मामला नहीं बनता। हाई कोर्ट ने निष्कर्ष निकाला कि इस मामले में धारा 306 के आवश्यक तत्व मौजूद नहीं हैं और मुकदमे को जारी रखना न्यायिक प्रक्रिया का दुरुपयोग होगा। इसलिए याचिका स्वीकार करते हुए एफआईआर और उससे संबंधित सभी कार्यवाहियां रद्द कर दी गईं।