मोनिका रावत | चंडीगढ़
समर न्यूज
पंजाब एवं हरियाणा हाई कोर्ट ने स्पष्ट किया है कि मोटर दुर्घटना मामलों में दिया जाने वाला उचित मुआवजा (जस्ट कंपेनसेशन) ऐसा होना चाहिए जो मृतक के आश्रितों को हुई वास्तविक आर्थिक क्षति का निष्पक्ष और न्यायसंगत प्रतिबिंब हो। अदालत ने कहा कि मुआवजा न तो ऐसा होना चाहिए जिससे दावेदारों को अनुचित लाभ मिले और न ही इतना कम कि कानून का कल्याणकारी उद्देश्य ही विफल हो जाए।
जस्टिस दीपक गुप्ता ने यह महत्वपूर्ण टिप्पणी वर्ष 2015 की सड़क दुर्घटना में जान गंवाने वाले एक कारोबारी के परिवार की अपील स्वीकार करते हुए की। हाई कोर्ट ने पाया कि मोटर दुर्घटना दावा अधिकरण (एमएसीटी), चंडीगढ़ ने मुआवजे की गणना करते समय भविष्य की आय वृद्धि (फ्यूचर प्रास्पेक्ट्स) को शामिल नहीं किया और व्यक्तिगत खर्चों की कटौती भी गलत आधार पर की। इसके चलते अदालत ने परिवार को दिए गए मुआवजे में 13.13 लाख रुपये की वृद्धि कर दी।
मामला कारोबारी की पत्नी, दो बच्चों और मां द्वारा दायर अपील से जुड़ा था। कारोबारी 31 जनवरी 2015 को मानसा से चंडीगढ़ जा रहे थे, तभी सड़क दुर्घटना में उनकी मृत्यु हो गई थी। एमएसीटी ने परिवार को 38.35 लाख रुपये का मुआवजा दिया था, लेकिन आश्रितों ने केवल मुआवजे की राशि को चुनौती देते हुए हाई कोर्ट का रुख किया।
हाई कोर्ट ने स्पष्ट किया कि दुर्घटना के लिए लापरवाही, वाहन के बीमा रहित होने तथा चालक और मालिक की संयुक्त एवं पृथक देयता संबंधी ट्रिब्यूनल के निष्कर्षों को किसी पक्ष ने चुनौती नहीं दी थी, इसलिए वे अंतिम रूप ले चुके हैं। मुआवजे की गणना पर विचार करते हुए अदालत ने माना कि ट्रिब्यूनल ने आयकर रिटर्न के आधार पर मृतक की वार्षिक आय 3,97,500 रुपये सही निर्धारित की थी, लेकिन 45 वर्षीय स्वरोजगार करने वाले व्यक्ति होने के कारण उसमें 25 प्रतिशत फ्यूचर प्रॉस्पेक्ट्स जोड़ना आवश्यक था। इससे वार्षिक आय 4,96,875 रुपये हो गई।
अदालत ने यह भी माना कि आश्रितों की निर्भरता की गणना से पहले आयकर की देय राशि घटाई जानी चाहिए। जस्टिस गुप्ता ने कहा, मोटर वाहन अधिनियम के तहत मुआवजे का उद्देश्य आश्रितों को कमाने वाले सदस्य की मृत्यु से हुए वास्तविक आर्थिक नुकसान की भरपाई करना है। इसलिए आय के उस हिस्से के आधार पर मुआवजे की गणना नहीं की जा सकती, जिसे मृतक कानूनन आयकर के रूप में राज्य को देने के लिए बाध्य था।
आयकर के 24,687 रुपये घटाने के बाद अदालत ने निर्भरता की गणना के लिए शुद्ध वार्षिक आय 4,72,188 रुपये मानी। इसके बाद हाई कोर्ट ने पाया कि चार आश्रित होने के बावजूद ट्रिब्यूनल ने व्यक्तिगत खर्च के रूप में एक-तिहाई आय घटा दी थी, जबकि कानून के अनुसार एक-चौथाई कटौती ही उचित थी। इस आधार पर परिवार के लिए वार्षिक आर्थिक योगदान 3,54,141 रुपये पुनर्निर्धारित किया गया।
पारंपरिक मदों के तहत भी मुआवजे में संशोधन करते हुए हाई कोर्ट ने आदेश दिया, अपीलकर्ता-दावेदारों को ट्रिब्यूनल द्वारा पहले से दिए गए मुआवजे के अतिरिक्त 13,13,000 रुपये का बढ़ा हुआ मुआवजा दिया जाता है। यह राशि दावा याचिका दायर किए जाने की तारीख से वास्तविक भुगतान तक 7.5 प्रतिशत वार्षिक ब्याज सहित देय होगी।