सफदरजंग अस्पताल में मृत घोषित; चार दशक पुराने दंगा मामलों में फैसलों का रहा उतार-चढ़ाव
एजेंसी | नई दिल्ली
1984 के सिख विरोधी दंगों के मामलों में उम्रकैद की सजा काट रहे कांग्रेस के पूर्व सांसद सज्जन कुमार का 80 वर्ष की उम्र में निधन हो गया। तिहाड़ जेल में बंद कुमार की तबीयत बिगड़ने के बाद उन्हें दिल्ली के सफदरजंग अस्पताल ले जाया गया, जहां चिकित्सकों ने उन्हें मृत घोषित कर दिया। अस्पताल से जुड़े सूत्रों के अनुसार, उन्हें अस्पताल लाए जाने तक उनकी मृत्यु हो चुकी थी।
उनकी मौत की तत्काल वजह स्पष्ट नहीं की गई है।
सज्जन कुमार दिल्ली की राजनीति में लंबे समय तक प्रभावशाली कांग्रेस नेता रहे। वह बाहरी दिल्ली लोकसभा क्षेत्र से तीन बार सांसद चुने गए थे। हालांकि, 1984 में तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी की हत्या के बाद दिल्ली में भड़की हिंसा से जुड़े मुकदमों ने उनके राजनीतिक जीवन की दिशा बदल दी। तीन दशक से अधिक समय तक चले मुकदमों के बाद 2018 में दिल्ली हाईकोर्ट ने उन्हें पांच सिखों की हत्या और गुरुद्वारा जलाने से जुड़े राजनगर मामले में उम्रकैद की सजा सुनाई थी। इसके बाद उन्होंने कांग्रेस से इस्तीफा दे दिया था।
सज्जन कुमार के खिलाफ 1984 की हिंसा से जुड़े कई मामले अलग-अलग अदालतों में चले। राजनगर पार्ट-1 मामले में पांच सिखों की हत्या और राजनगर पार्ट-2 में गुरुद्वारा जलाने से जुड़े मामले में दिल्ली हाईकोर्ट की सजा के बाद वह दिसंबर 2018 से जेल में थे। इस फैसले के खिलाफ उनकी अपील सुप्रीम कोर्ट में लंबित थी। अप्रैल में सुप्रीम कोर्ट ने उनकी अपील पर जुलाई में सुनवाई करने पर सहमति जताई थी। उसी दौरान अदालत ने उनकी जमानत की मांग स्वीकार नहीं की थी। इसके अलावा, दिल्ली की राउज एवेन्यू अदालत ने फरवरी 2025 में सरस्वती विहार इलाके में जसवंत सिंह और उनके बेटे तरुणदीप सिंह की हत्या के मामले में भी कुमार को दोषी ठहराया और उम्रकैद की सजा सुनाई।
अदालत ने उनकी उम्र, स्वास्थ्य और जेल में आचरण को देखते हुए मामले को फांसी के लिए ‘दुर्लभतम में दुर्लभ’ श्रेणी का नहीं माना। पीड़ित परिवार और अभियोजन पक्ष ने मौत की सजा की मांग की थी।
हालांकि, हर मामले में अदालत का फैसला उनके खिलाफ नहीं गया। जनवरी 2026 में राउज एवेन्यू अदालत ने जनकपुरी-विकासपुरी हिंसा से जुड़े एक मामले में उन्हें बरी कर दिया था।
अदालत ने कहा था कि अभियोजन की ओर से पेश साक्ष्य दोषसिद्धि के लिए आवश्यक स्तर तक नहीं पहुंचते। इस फैसले को पीड़ित परिवारों और सिख संगठनों ने निराशाजनक बताया था।
एसजीपीसी और अकाल तख्त ने उठाए थे सवाल
जनवरी में बरी किए जाने के बाद शिरोमणि गुरुद्वारा प्रबंधक कमेटी के अध्यक्ष हरजिंदर सिंह धामी ने फैसले को पीड़ित परिवारों के साथ अन्याय बताया था। उन्होंने कहा था कि जिन परिवारों ने चार दशक से अधिक समय तक न्याय की प्रतीक्षा की, उनके लिए यह फैसला गहरा आघात है। अकाल तख्त के कार्यवाहक जत्थेदार ज्ञानी कुलदीप सिंह गर्गज ने भी सवाल उठाया था कि यदि इस मामले में सज्जन कुमार जिम्मेदार नहीं थे तो 1984 की उस हिंसा के पीछे कौन था। फरवरी 2025 में सरस्वती विहार मामले में उम्रकैद की सजा सुनाए जाने के बाद दिल्ली सिख गुरुद्वारा प्रबंधक कमेटी के महासचिव जगदीप सिंह कहलों ने भी कहा था कि कुमार को मौत की सजा मिलनी चाहिए थी। वहीं एसजीपीसी अध्यक्ष हरजिंदर सिंह धामी ने उनकी दोषसिद्धि का स्वागत करते हुए कठोरतम सजा की मांग की थी।
चार दशक पुराना घाव
1984 की हिंसा इंदिरा गांधी की 31 अक्टूबर को उनके दो सिख अंगरक्षकों द्वारा हत्या के बाद दिल्ली समेत कई हिस्सों में भड़की थी। आधिकारिक मामलों और जांच रिपोर्टों में दिल्ली में हजारों लोगों, मुख्य रूप से सिखों, के मारे जाने का उल्लेख मिलता है। दिल्ली में दर्ज 587 प्राथमिकी में करीब 2,733 मौतों का उल्लेख नानावती आयोग से जुड़े आंकड़ों में किया गया था। लंबे समय तक अनेक मामले बंद रहे या उनमें आरोपी बरी हुए, लेकिन बाद में विशेष जांच दल की जांच से कुछ मामलों में दोबारा कानूनी कार्रवाई आगे बढ़ी। सज्जन कुमार की मौत ऐसे समय हुई जब 1984 से जुड़े मामलों में उनकी कानूनी लड़ाई पूरी तरह खत्म नहीं हुई थी। सुप्रीम कोर्ट में राजनगर मामले की उनकी अपील पर सुनवाई प्रस्तावित थी। उनकी मृत्यु के साथ उनके खिलाफ लंबित व्यक्तिगत आपराधिक कार्यवाही का भविष्य अब कानूनी प्रक्रिया के अनुसार तय होगा।