दलजीत विक्की | लुधियाना
समर न्यूज
पंजाब में 2027 विधानसभा चुनाव से पहले शिरोमणि अकाली दल और भारतीय जनता पार्टी के बीच गठबंधन की अटकलें फिर तेज हो गई हैं। दोनों दलों के बीच पर्दे के पीछे बातचीत जारी रहने की खबरों के बीच सबसे बड़ी अड़चन सीटों के बंटवारे व चुनावी नेतृत्व पर है।
भाजपा अब पुराने 94:23 के फॉर्मूले पर लौटने के बजाय गठबंधन में अपनी हिस्सेदारी बढ़ाने की इच्छा रखती है। दूसरी ओर, अकाली दल अपने पारंपरिक प्रभाव वाले ग्रामीण क्षेत्रों में सीटें छोड़ने को लेकर सहज नहीं है। ताजा राजनीतिक घटनाक्रम में भाजपा की ओर से सभी 117 सीटों पर अकेले चुनाव लड़ने के बयान भी सामने आए हैं, इसलिए गठबंधन को अभी अंतिम रूप मिला हुआ नहीं माना जा सकता। 2024 के लोकसभा चुनाव में भाजपा ने पंजाब की सभी 13 सीटों पर चुनाव लड़ते हुए 18.56 प्रतिशत वोट हासिल किए थे, लेकिन वह कोई सीट नहीं जीत सकी। सुखबीर सिंह बादल के नेतृत्व वाले अकाली दल को 13.42 प्रतिशत वोट मिले और उसने एक सीट जीती।
दोनों दलों का संयुक्त वोट प्रतिशत करीब 31.98 रहा। 2022 के विधानसभा चुनाव में अकाली दल को तीन और भाजपा को दो सीटें मिली थीं। इन आंकड़ों ने दोनों दलों के बीच संभावित चुनावी तालमेल को लेकर चर्चा को आधार दिया है, हालांकि लोकसभा और विधानसभा चुनाव के वोट व्यवहार को सीधे एक जैसा मानना उचित नहीं होगा। पुराने गठबंधन में भाजपा सीमित सीटों पर चुनाव लड़ती थी और अकाली दल बड़ा साझेदार होता था। अब भाजपा पंजाब में अपने विस्तार और 2024 के लोकसभा प्रदर्शन को आधार बनाकर अधिक सीटें चाहती है। भाजपा की हिस्सेदारी 50 से 55 सीटों के आसपास होने की चर्चा है। यह संख्या अंतिम या आधिकारिक नहीं है। भाजपा के नेताओं ने सार्वजनिक रूप से 117 सीटों पर चुनाव लड़ने की तैयारी की बात कही है, जिससे साफ है कि पार्टी फिलहाल गठबंधन के विकल्प के साथ-साथ अकेले चुनाव की तैयारी भी जारी रखे हुए है।
{अकाली दल की चुनौती
2022 में अकाली दल महज तीन विधानसभा सीटें जीत पाया था। इसके बाद 2024 के लोकसभा चुनाव में उसका वोट प्रतिशत भी घटकर 13.42 रह गया। ऐसे में भाजपा के साथ गठबंधन अकाली दल के लिए अपने राजनीतिक आधार को मजबूत करने का अवसर हो सकता है। वहीं अकाली दल के लिए चुनौती यह है कि वह गठबंधन की शर्तों में अपनी क्षेत्रीय पहचान और ग्रामीण संगठन की भूमिका को कमजोर न होने दे। दोनों दलों के बीच संभावित समझौते में कौन-सी सीट किसके हिस्से आएगी, यह सबसे कठिन मुद्दों में से एक माना जा रहा है।
{पुनर सुरजीत अकाली दल की अलग राह: ज्ञानी हरप्रीत सिंह के नेतृत्व वाला शिरोमणि अकाली दल (पुनर सुरजीत) भी भाजपा के साथ संभावित समझौते को लेकर बातचीत के संकेत दे चुका है। हालांकि ताजा घटनाक्रम में उसने सुखबीर बादल के नेतृत्व वाले अकाली दल के साथ गठबंधन से दूरी का संकेत दिया है। पार्टी पंथक और पंजाब से जुड़े मुद्दों पर व्यापक राजनीतिक समझ की तलाश में है। इसलिए भाजपा, सुखबीर बादल का अकाली दल और पुनर्सुर्जित अकाली दल—तीनों को एक मंच पर लाने की चर्चा को फिलहाल संभावित राजनीतिक समीकरण से आगे नहीं माना जा सकता।
{नेतृत्व भी बड़ा सवाल: सीटों के बाद मुख्यमंत्री पद का चेहरा गठबंधन के लिए दूसरी बड़ी चुनौती हो सकता है। भाजपा के बढ़े राजनीतिक आधार के बाद वह गठबंधन में अधिक प्रभाव चाहती है, जबकि अकाली दल के लिए सुखबीर बादल का नेतृत्व महत्वपूर्ण है। संभावित गठबंधन में मुख्यमंत्री और उपमुख्यमंत्री पद तथा सत्ता में हिस्सेदारी का फार्मूला भी बातचीत का हिस्सा बन सकता है। फिलहाल किसी दल ने इस संबंध में अंतिम फैसला सार्वजनिक नहीं किया है।
{पुराना गठबंधन, नई परिस्थितियां: भाजपा और अकाली दल लंबे समय तक पंजाब की राजनीति में सहयोगी रहे, लेकिन कृषि कानूनों के मुद्दे पर 2020 में उनका गठबंधन टूट गया था। अब दोनों दलों की राजनीतिक स्थिति पहले जैसी नहीं है। भाजपा का वोट आधार बढ़ा है, जबकि अकाली दल का चुनावी प्रदर्शन कमजोर हुआ है। इसलिए इस बार गठबंधन हुआ तो सीटों और नेतृत्व में पुराने समीकरण की पुनरावृत्ति के बजाय नई शक्ति-संतुलन की तस्वीर देखने को मिल सकती है। फिलहाल भाजपा और अकाली दल के बीच संभावित गठबंधन को लेकर चर्चाएं जारी हैं।