हिमाचल के शहद को मिलेगी नई पहचान, मीड के जरिए बढ़ेगी मधुमक्खी पालकों की कमाई की उम्मीद
Summer express राहुल चावला, धर्मशाला-:हिमाचल प्रदेश में मधुमक्खी पालन से जुड़े किसानों और ग्रामीण परिवारों के लिए शहद की बिक्री लंबे समय से एक बड़ी चुनौती रही है। बाजार में कीमतों का उतार-चढ़ाव, बिचौलियों पर निर्भरता और उत्पाद की बिक्री को लेकर अनिश्चितता के कारण कई बार मधुमक्खी पालकों को उनकी मेहनत के अनुरूप लाभ नहीं मिल पाता। अब प्रदेश के शहद को एक नए उत्पाद के रूप में बाजार तक पहुंचाने की पहल की जा रही है। हिमाचल के शहद से मीड नामक किण्वित मादक पेय तैयार किया जा रहा है। इस प्रयास के माध्यम से शहद के लिए नए बाजार विकसित करने और मधुमक्खी पालकों को बिक्री के अतिरिक्त विकल्प उपलब्ध करवाने की संभावनाएं तलाशी जा रही हैं।
शहद से मीड बनाने की पहल, पारंपरिक बाजार से आगे बढ़ने की तैयारी
हाइव बॉर्न ब्रांड के संस्थापक अर्पित कुमार पांडे के अनुसार, हिमाचल प्रदेश में उत्पादित शहद की गुणवत्ता को ध्यान में रखते हुए मीड तैयार करने की योजना बनाई गई है। मीड शहद को किण्वित करके बनाया जाने वाला मादक पेय है। भारत में यह उत्पाद अभी अपेक्षाकृत नई श्रेणी में आता है। ऐसे में इसके माध्यम से शहद के इस्तेमाल का दायरा बढ़ाने और उपभोक्ताओं के सामने एक नया विकल्प प्रस्तुत करने का प्रयास किया जा रहा है।इस पहल का एक प्रमुख उद्देश्य मधुमक्खी पालकों के लिए शहद की बिक्री के नए रास्ते खोलना है। वर्तमान में कई उत्पादकों को अपना शहद बेचने के लिए सीमित बाजारों पर निर्भर रहना पड़ता है। कीमतों में गिरावट आने पर उनकी आमदनी प्रभावित होती है। यदि प्रसंस्करण उद्योग की ओर से शहद की नियमित खरीद की व्यवस्था विकसित होती है, तो उत्पादकों को अपनी उपज बेचने के लिए एक अतिरिक्त बाजार मिल सकता है।
कांगड़ा और कुल्लू के शहद को मिलेगा व्यापक बाजार
अर्पित कुमार पांडे के मुताबिक, मीड को हिमाचल प्रदेश के बाजार में उतारा जा चुका है। शुरुआती चरण में शिमला, मनाली, कुल्लू, कांगड़ा, धर्मशाला, बद्दी और सोलन सहित कई क्षेत्रों में उत्पाद की आपूर्ति की गई है। कंपनी का दावा है कि शुरुआती ग्राहकों से सकारात्मक प्रतिक्रिया मिली है और कुछ ग्राहकों ने दोबारा खरीदारी भी की है। हालांकि, बिक्री और ग्राहकों की प्रतिक्रिया से संबंधित आंकड़ों की स्वतंत्र पुष्टि उपलब्ध नहीं है।कंपनी अब प्रदेश से बाहर भी अपने उत्पाद की पहुंच बढ़ाने की तैयारी कर रही है। इसके लिए चंडीगढ़, मुंबई, बेंगलुरु और गोवा जैसे शहरों में बाजार तलाशने की योजना है। भविष्य में अंतरराष्ट्रीय बाजारों तक पहुंच बनाने की संभावनाओं पर भी विचार किया जा रहा है।यदि इन बाजारों में उत्पाद की मांग बढ़ती है, तो हिमाचल में उत्पादित शहद के व्यावसायिक उपयोग का दायरा बढ़ सकता है। इससे शहद उत्पादकों को पारंपरिक बिक्री व्यवस्था के अतिरिक्त प्रसंस्करण आधारित बाजार से जुड़ने का अवसर मिल सकता है।
सालाना 50 से 60 टन शहद की खपत का लक्ष्य
मधुमक्खी पालकों के लिए संभावित लाभ को लेकर कंपनी ने आने वाले समय में उत्पादन बढ़ाने की योजना बनाई है। अर्पित कुमार पांडे के अनुसार, अगले एक से डेढ़ साल के दौरान कंपनी अपनी क्षमता के अनुरूप हर महीने दो से तीन बैच तैयार करने की दिशा में काम कर सकती है। इस लक्ष्य के आधार पर सालाना लगभग 50 से 60 टन शहद की खपत की संभावना जताई गई है।
हालांकि, यह अनुमान कंपनी की भविष्य की योजना से जुड़ा है। फिलहाल इतनी मात्रा में शहद की खपत शुरू होने की पुष्टि नहीं हुई है। इस लक्ष्य को हासिल करने के लिए उत्पाद की मांग, उत्पादन क्षमता और बाजार में बिक्री का विस्तार महत्वपूर्ण होगा।यदि कंपनी नियमित रूप से शहद की खरीद बढ़ाने में सफल रहती है, तो मधुमक्खी पालकों को अपनी उपज बेचने के लिए एक और विकल्प मिल सकता है। इससे उन उत्पादकों को भी प्रोत्साहन मिलने की उम्मीद है, जो कम कीमत मिलने और बाजार में अनिश्चितता के कारण इस व्यवसाय से दूरी बनाने पर विचार करते हैं।
उत्पादन संयंत्र से स्थानीय रोजगार की संभावनाएं
इस पहल के माध्यम से रोजगार के नए अवसर पैदा होने की भी उम्मीद जताई जा रही है। शहद की खरीद से लेकर प्रसंस्करण, पैकेजिंग, परिवहन और वितरण तक विभिन्न स्तरों पर काम की संभावनाएं बन सकती हैं।पांडे के अनुसार, कंपनी अगले दो से तीन वर्षों में अपना उत्पादन संयंत्र स्थापित करने की संभावनाएं तलाश रही है। यदि यह योजना साकार होती है, तो स्थानीय लोगों को रोजगार देने को प्राथमिकता देने का प्रयास किया जाएगा। हालांकि, संयंत्र की स्थापना, निवेश, रोजगार की संख्या और परियोजना की समय-सीमा को लेकर अभी स्पष्ट जानकारी सामने नहीं आई है।
बाजार की स्थिरता तय करेगी पहल की सफलता
हिमाचल प्रदेश में मधुमक्खी पालन ग्रामीण अर्थव्यवस्था को मजबूत करने और स्वरोजगार बढ़ाने का एक महत्वपूर्ण माध्यम है। इस क्षेत्र को आगे बढ़ाने के लिए उत्पादन के साथ-साथ शहद की उचित कीमत और नियमित बिक्री सुनिश्चित करना भी जरूरी है।मीड जैसे नए उत्पाद शहद के वैकल्पिक इस्तेमाल को बढ़ावा दे सकते हैं। हालांकि, इस पहल की वास्तविक सफलता इस बात पर निर्भर करेगी कि कंपनी कितनी नियमितता से शहद खरीदती है, उत्पाद की बाजार में कितनी मांग बनती है और मधुमक्खी पालकों को उनकी उपज का कितना लाभकारी मूल्य मिलता है।