ईरान | ईरान, जिसे प्राचीन काल में फारस के नाम से जाना जाता था, दुनिया की सबसे पुरानी और समृद्ध सभ्यताओं में से एक रहा है। इसका रणनीतिक भूगोल इसे सदियों से बाहरी आक्रमणों का केंद्र बनाता रहा है—चाहे वह अरबों के हमले हों, मंगोलों का आतंक या फिर आज के दौर में इज़रायल और अमेरिका के साथ गहराता तनाव।
फारस से ईरान तक: इतिहास में जंग और सत्ता परिवर्तन
7वीं शताब्दी में जब ईरान सासानी साम्राज्य के अधीन था, तब अरब सेनाओं ने इस पर आक्रमण किया। इस संघर्ष में सासानी सत्ता समाप्त हो गई और इस्लाम का प्रसार शुरू हुआ। यहीं से शिया समुदाय के उदय और पारंपरिक फारसी संस्कृति के इस्लामी रंग में ढलने की शुरुआत हुई।
तुर्कों और मंगोलों ने भी नहीं छोड़ा ईरान
11वीं और 12वीं सदी में तुर्क आक्रमणकारियों ने ईरान की सत्ता पर कब्जा जमाया। इससे देश की सांस्कृतिक और राजनीतिक व्यवस्था हिल गई, लेकिन फारसी पहचान पूरी तरह नहीं मिट सकी।
इसके बाद आया मंगोल आक्रांता चंगेज खान। 13वीं शताब्दी की शुरुआत में उसने ईरान के शहरों को खून से रंग डाला। लाखों लोगों की जान गई, ऐतिहासिक विरासतें नष्ट हुईं, लेकिन चंगेज की अगली पीढ़ी ने इस्लाम के साथ-साथ फारसी संस्कृति को भी अपनाया, जिससे यह सभ्यता किसी तरह ज़िंदा रही।
इस्लामिक क्रांति और नया दौर का टकराव
1979 में ईरान में इस्लामिक क्रांति के बाद एक नई शासन प्रणाली अस्तित्व में आई। पश्चिमी समर्थक शासन को हटाकर आयतुल्ला खुमैनी के नेतृत्व में एक धार्मिक सरकार बनी। हालांकि इस बदलाव के बाद भी शांति नहीं आई। अमेरिका और इज़रायल के साथ तनाव और अधिक गहराता गया।
परमाणु कार्यक्रम से लेकर मौजूदा सैन्य तनाव तक
इस्लामिक क्रांति के बाद ईरान और अमेरिका-इज़रायल के रिश्ते लगातार बिगड़ते चले गए। कभी परमाणु कार्यक्रम को लेकर वैश्विक दबाव तो कभी ड्रोन हमलों और साइबर युद्ध के आरोपों ने ईरान को अंतरराष्ट्रीय मंच पर निशाने पर रखा। वर्तमान में, 2025 में, एक बार फिर अमेरिका और इज़रायल के साथ सैन्य टकराव की स्थिति बन रही है—जो ईरान के इतिहास की जटिल परतों की ताजा पुनरावृत्ति जैसा प्रतीत होता है।