Una, Rakesh
ऊना जिला के चताड़ा गांव के किसान छज़्ज़ा सिंह बीते 50 वर्षों से परंपरागत तरीके से खेती कर रहे हैं। आधुनिक युग में जहां किसान ट्रैक्टर व मशीनों की मदद से खेती कर रहे हैं, वहीं छज़्ज़ा सिंह आज भी अपने बैलों के साथ करीब 50 कनाल भूमि पर मक्की की फसल उगा रहे हैं। उनका मानना है कि बैलों से खेती करने में लागत बहुत कम आती है और शरीर की कसरत भी होती है, जिससे किसान स्वस्थ भी रहता है।
छज़्ज़ा सिंह बताते हैं कि उनके बुजुर्ग भी बैलों से ही खेती करते थे और उन्होंने भी उसी परंपरा को आगे बढ़ाया है। उनका कहना है कि आधुनिक खेती में मशीनों, ट्रैक्टरों और ईंधन का खर्च बहुत अधिक होता है, जबकि बैलों के जरिए खेती सस्ती और टिकाऊ होती है। उन्होंने मक्की की फसल में बैलों से मिट्टी चढ़ाई, ताकि पैदावार बेहतर हो।
महंगाई व सरकारी उदासीनता से किसान परेशान
किसान साकिन्द्र सिंह ने बताया कि मौजूदा समय में खेती घाटे का सौदा बन चुकी है। लगातार बढ़ती महंगाई ने किसान की कमर तोड़ दी है। खाद, बीज और कीटनाशकों के दाम आसमान छू रहे हैं। उन्होंने कहा कि इस बार उनकी मक्की की फसल कीड़े लगने से बर्बाद हो रही है, लेकिन कृषि विभाग से कोई अधिकारी न तो फसल देखने आया और न ही कोई मदद दी गई।
साकिन्द्र सिंह का कहना है कि विभाग की ओर से किसी तरह की जागरूकता या वैकल्पिक खेती के लिए मार्गदर्शन नहीं मिल रहा, जिससे नई पीढ़ी खेती छोड़कर अन्य रोजगार की ओर जा रही है। उन्हें अपनी फसल का वाजिब दाम नहीं मिल पा रहा, जिससे परिवार चलाना भी मुश्किल हो गया है।