10 August, 2025
ऋषि विश्वामित्र द्वारा प्रदत्त गायत्री महामंत्र का छन्द गायत्री है और इसके देवता सविता हैं, जिन्हें बोल-चाल की भाषा में सूर्य भी कहा जाता है। सविता की अधिष्ठात्री देवी होने के कारण गायत्री को सावित्री नाम से भी जाना जाता है। सविता और सावित्री का दिव्य युग्म प्राचीन काल से ही विख्यात है।
इस मंत्र में सवितृ देव की उपासना की जाती है, इसलिए इसे सावित्री मंत्र भी कहते हैं। श्री गायत्री देवी के स्त्री रूप की पूजा का विधान भी प्राचीन परंपरा में स्थापित है। मंत्र के पवित्र अक्षर — भूर्भुवः स्वः। तत्सवितुर्वरेण्यं — में सम्पूर्ण ब्रह्मांड की ऊर्जा निहित है।
गायत्री को वेदों, शास्त्रों और श्रुतियों की जननी माना जाता है, इसलिए उन्हें वेद माता के रूप में पूजते हैं। त्रिदेव — ब्रह्मा, विष्णु और महेश — भी उनकी आराधना करते हैं, अतः वे देवमाता हैं। ज्ञान की अधिष्ठात्री देवी होने के कारण उन्हें ज्ञान-गंगा भी कहा जाता है।
यह रहा आपका दिया हुआ विवरण एक प्राचीन समाचार शैली में तैयार करके
गायत्री महामंत्र – ज्ञान और प्रकाश का सनातन स्रोत
ऋषि विश्वामित्र द्वारा रचित गायत्री महामंत्र वैदिक काल से ही मानवता का मार्गदर्शन कर रहा है। मंत्र इस प्रकार है—
‘ॐ भूर्भुवः स्वः तत्सवितुर्वरेण्यं भर्गो देवस्य धीमहि धियो यो नः प्रचोदयात्।’
अर्थ — हम उस परमात्मा का ध्यान करते हैं, जो सभी दुखों का अंत करने वाला, सुख प्रदान करने वाला, तेजस्वी, पवित्र और हमारी बुद्धि को धर्म के मार्ग पर प्रेरित करने वाला है।
यह महामंत्र सविता देव की उपासना का सर्वोच्च साधन है, जिसे सावित्री मंत्र भी कहा जाता है। वैदिक परंपरा में इसे वेदमाता गायत्री का रूप मानकर स्त्री स्वरूप में भी पूजा जाता है।
गायत्री को वेदों, शास्त्रों और श्रुतियों की जननी कहा गया है। यही कारण है कि त्रिदेव — ब्रह्मा, विष्णु और महेश — भी उनकी आराधना करते हैं। ज्ञान, शक्ति और पवित्रता का यह स्रोत आज भी युगों-युगों से साधकों का पथ आलोकित कर रहा है।