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हम_प्राकृतिक_खिलवाड़_के_लिए_जिम्मेवार

(  संपादकीय लेख ) एपीआरओ शिमला अजय बनयाल

इंसान अपने लिए हर सुविधा हर कीमत पर हासिल करना चाहता है। इसके  लिए इंसान सदियों से कार्य करता आ रहा है। प्रकृति को नुक्सान पहुचाने में इंसान अपनी गलती स्वीकार करने को तैयार ही नहीं होता है। सिस्टम को कोसना हमारी प्राथमिकता बन चुकी है। लेकिन सिस्टम को मैं और हम सब मिलकर बनाते है। इसी सिस्टम, समाज नेे मिलकर  प्रकृति के सामने अनेको चुनौतियां खड़ी करके रख दी है। पर्यावरण के लिए नीति निर्माण करने वाली सरकारों को चयन हम सब मिल करते है । हम ही विधायक, सांसद चुनते है। हम अपने हितों के मुताबिक ही उनसे कार्य करवाने के दबाब बनाते आए है । सरकारों के दबाब में नीति निर्माण  करने वाली अफसरशाही  नीति बनाती आई है। ऐसे में अगर हमारी नीतियों और लापरवाहियों के कारण प्रकृति को हानि हो रही है । तो इसके लिए मैं और हम जिम्मेवार है।

आज दुनिया  ग्लोबल वार्मिग और जलवायु परिवर्तन की समस्या से जूझ रही है। इस वजह से प्रकृति में पिछले कई दशकों से बदलाव रहा है। हांलाकि दोनों अलग अलग है है। ग्लोबल वार्मिग पृथ्वी की जलवायु प्रणाली में तापमान में दीर्घकालिक वृद्धि  है, जबकि जलवायु परिवर्तन तापमान वर्षा और वायु पैटर्न में होने वाले व्यापक और दीर्घकालिक बदलावों की विस्तृत श्रंखला है। इन दोनों के विस्तार में मानवीय कारणों की अहम भूमिका है।वैसे तो प्राकृतिक कारक – जैसे सौर चक्र, ज्वालामुखी गतिविधि, तथा पृथ्वी की परिक्रमा और घूर्णन पैटर्न में परिवर्तन – लम्बे समय तक पृथ्वी के तापमान में परिवर्तन में योगदान करते हैं। लेकिन मानवीय कारकों में वे प्रथाएं शामिल हैं जो कार्बन डाइऑक्साइड, नाइट्रस ऑक्साइड और मीथेन जैसी ग्रीनहाउस गैसों का उत्सर्जन करती हैं , जो हमारे ग्रह पर ग्रीनहाउस गैस वार्मिंग प्रभाव में योगदान करती हैं।

हर साल, जीवाश्म ईंधन के जलने से दुनिया भर में लगभग 33 अरब टन कार्बन डाइऑक्साइड उत्सर्जित होती है । इसमें से 44 फीसदी कोयला, 34 फीसदी तेल और शेष 21 फीसदी प्राकृतिक गैस के कारण उत्सर्जित होता है। कारों, ट्रेनों, विमानों और समुद्री जहाजों में इस्तेमाल होने वाले ईंधन के जलने से भारी मात्रा में कार्बन डाइऑक्साइड उत्सर्जित होती है। परिवहन क्षेत्र हर साल सबसे ज्यादा ग्रीनहाउस गैसों के उत्सर्जन के लिए जिम्मेदार है। संयुक्त राज्य अमेरिका में 2020 में, परिवहन क्षेत्र ने सभी ग्रीनहाउस गैसों का 27 फीसदी उत्सर्जन किया । ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जन के लिए बिजली उत्पादन भी एक बड़ा कारण है। क्योंकि दुनिया का ज्यादातर हिस्सा ऊर्जा के लिए कोयले पर निर्भर है।दुनिया के लगभग एक-तिहाई जंगल खत्म हो गए हैं , और उनकी जगह मुख्य रूप से कृषि भूमि ने ले ली है।  सौभाग्य से, 1980 के दशक में 15 करोड़ हेक्टेयर वन भूमि के नुकसान के अपने चरम के बाद से वनों की कटाई की दर में कमी आई है। 1990 के दशक में, दुनिया ने 7.8 करोड़ हेक्टेयर वन भूमि खो दी, फिर 2000 के दशक में यह घटकर 5.2 करोड़ हेक्टेयर और 2010 के दशक में 4.7 करोड़ हेक्टेयर रह गई।   पशुधन पालन वैश्विक ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जन का 14.5 फीसदी उत्सर्जन करने के लिए जिम्मेदार है । मवेशी ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जन के लिए मुख्य रूप से जिम्मेदार हैं, मुख्यतः मीथेन के रूप में, जो उनकी पाचन प्रक्रिया के दौरान उत्सर्जित होती है। मीथेन का कार्बन डाइऑक्साइड की तुलना में कहीं अधिक ऊष्मायन प्रभाव होता है, हालाँकि यह वायुमंडल में उतनी देर तक नहीं रहता।   एयर कंडीशनर और रेफ्रिजरेटर के अत्यधिक उपयोग से, मनुष्य पर्यावरण में सीएफसी (कार्बन डाइऑक्साइड) जोड़ रहा है जो वायुमंडलीय ओजोन परत को प्रभावित करता है। औद्योगीकरण के आगमन के साथ, पृथ्वी का तापमान तेजी से बढ़ रहा है। कारखानों से निकलने वाला हानिकारक उत्सर्जन पृथ्वी के बढ़ते तापमान में और इजाफा कर रहा है।जनसंख्या वृद्धि का मतलब है ज्यादा लोगों का साँस लेना। इससे वायुमंडल में कार्बन डाइऑक्साइड का स्तर बढ़ता है, जो ग्लोबल वार्मिंग का मुख्य कारण है।

अगर धरती इसी दर से गर्म होती रही, तो ग्लोबल वार्मिंग से बड़े पैमाने पर विलुप्ति की आशंका है। दरअसल, एक अध्ययन में पाया गया है कि हम छठे बड़े पैमाने पर विलुप्ति के करीब पहुँच रहे हैं , जिसमें अगले 300 सालों में तीन-चैथाई पशु प्रजातियाँ विलुप्त हो सकती हैं। 2013 में, जलवायु परिवर्तन पर अंतर-सरकारी पैनल ने अपनी रिपोर्ट में बताया कि 1880 और 2012 के बीच वैश्विक तापमान में 0.9 डिग्री सेल्सियस की वृद्धि हुई है। औद्योगिकीकरण से पहले के औसत तापमान की तुलना में यह वृद्धि 1.1 डिग्री सेल्सियस है।

पारिस्थितिकी तंत्र के लिए खतरे हो रहा है। लोबल वार्मिंग के कारण जलवायु परिवर्तन हो रहा है। कहीं सूखा पड़ रहा है तो कहीं बाढ़। यह जलवायु असंतुलन ग्लोबल वार्मिंग का ही परिणाम है। ग्लोबल वार्मिंग के कारण गर्मी और नमी के पैटर्न में बदलाव आ रहा है। इससे मच्छरों की आवाजाही बढ़ रही है जो बीमारियाँ फैलाते और फैलाते हैं। बाढ़, सुनामी और अन्य प्राकृतिक आपदाओं में वृद्धि के कारण, आमतौर पर औसत मृत्यु दर बढ़ जाती है। जलवायु में वैश्विक परिवर्तन के कारण कई पौधों और जानवरों के आवास नष्ट हो रहे हैं।

हम कार्बन डाइऑक्साइड का उत्सर्जन उस स्तर तक कर रहे हैं जो पौधों और महासागरों के लिए अत्यधिक हानिकारक है। आज वायुमंडल में कार्बन डाइऑक्साइड की मात्रा पिछले 800,000 वर्षों की तुलना में कहीं अधिक है । अमेरिका विश्व की जनसंख्या का 4 फीसदी है, लेकिन जीवाश्म ईंधन के जलने से होने वाले ऐतिहासिक कार्बन डाइऑक्साइड प्रदूषण के 25 फीसदी के लिए वह जिम्मेदार है। इस सदी के अंत तक, ग्लोबल वार्मिंग के कारण समुद्र का स्तर 7-23 इंच बढ़ जाएगा । पिछली सदी में ही यह 7 इंच बढ़ गया है, जो पिछले 2000 वर्षों के कुल स्तर से भी ज्यादा है। अकेले अमेरिका में, वर्ष 2100 तक समुद्र के बढ़ते स्तर के कारण 1.3 करोड़ लोगों को विस्थापित होना पड़ सकता है । 1880 के बाद से दुनिया भर में औसत तापमान लगातार बढ़ रहा है। वर्ष 2100 तक औसत तापमान 3.1 डिग्री सेल्सियस तक बढ़ जाएगा ।

आर्कटिक ग्लोबल वार्मिंग से सबसे ज्यादा प्रभावित क्षेत्रों में से एक है क्योंकि यहाँ का औसत तापमान वैश्विक औसत से दोगुना बढ़ गया है। इस क्षेत्र में बर्फ तेजी से पिघल रही है और 2040 तक यहाँ बर्फ रहित ग्रीष्मकाल होने की संभावना है । पिछला दशक पिछले 140 वर्षों में रिकॉर्ड शुरू होने के बाद से सबसे गर्म दशक था। 1850 में, मोंटाना ग्लेशियर नेशनल पार्क में 150 ग्लेशियर थे , लेकिन आज, केवल 25 ही बचे हैं। ग्लेशियरों का पिघलना समुद्र के स्तर में वृद्धि के लिए जिम्मेदार है, और यह उन स्थानों में मीठे पानी की कमी के लिए भी जिम्मेदार है जो प्राकृतिक जल स्रोतों पर निर्भर हैं। जलवायु परिवर्तन के कारण लुप्त होते आवासों के कारण 10 लाख से अधिक प्रजातियों के विलुप्त होने का खतरा उत्पन्न हो गया है। रीढ़ की हड्डी वाली 680 प्रजातियां तथा भोजन के लिए प्रयुक्त स्तनधारियों की 559 पालतू नस्लें 1600 से अब तक विलुप्त हो चुकी हैं । वर्ष 2000 और 2100 के बीच गर्मी से संबंधित मौतों की संख्या लगभग 150,000 तक बढ़ सकती है ।

ग्लोबल वार्मिंग के प्रभावों को कम करने में सरकारों, व्यवसायों और व्यक्तियों, सभी की भूमिका है। सरकारें महत्वाकांक्षी उत्सर्जन कटौती लक्ष्य निर्धारित कर सकती हैं और उन्हें प्राप्त करने के लिए नीतियाँ लागू कर सकती हैं। व्यवसाय स्थायी प्रथाओं को अपनाकर अपने कार्बन उत्सर्जन को कम कर सकते हैं। व्यक्ति अपनी जीवनशैली में बदलाव ला सकते हैं, जैसे पैदल चलना, साइकिल चलाना, या गाड़ी चलाने के बजाय सार्वजनिक परिवहन का उपयोग करनाय मांस की खपत कम करनाय और ऊर्जा-कुशल उपकरणों का उपयोग करना।  2030 तक सस्टेनेबल डेवलपमेंट के 17 लक्ष्य हासिल करने हैं, लेकिन सस्टेनेबल डेवलपमेंट कैसे होगा? जब प्लानिंग सही होगी, लैंड यूज सही होगा। इस दिशा में कार्य करना होगा। जरूरत मौसम को कोसने की नहीं, बल्कि मौसम के प्रति जागरूक होने की है। मौसम को अपने दिनचर्या में शामिल करने की है। मौसम की चेतावनी देखकर अपने काम की योजना बनाएं। नदी-नालों की जमीन से दूर घर बनाए  तो बारिश आपदा नहीं बनेगी। साथ ही यह भी ध्यान रखना होगा कि जब तक सिस्टम में गुड गवर्नेंस का अभाव रहेगा, तब तक पर्यावरण नहीं बचेगा, तब तक सस्टेनेबल डेवलपमेंट नहीं होगा।

Chandrika

chandrika@summerexpress.in

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