26 October, 2025
छठ पूजा सूर्य देव की उपासना का महापर्व माना जाता है। इस दौरान व्रती महिलाएं पारंपरिक शृंगार करती हैं, जिसमें नाक से मांग तक सिंदूर लगाना खास महत्व रखता है। बिहार, झारखंड, पूर्वी उत्तर प्रदेश और नेपाल में यह परंपरा विशेष रूप से प्रचलित है।
धार्मिक महत्व
हिंदू धर्म में विवाहित महिलाओं के सोलह शृंगारों में से सिंदूर महत्वपूर्ण माना जाता है। यह वैवाहिक जीवन की पहचान और पति की दीर्घायु का प्रतीक है। छठ पूजा में महिलाएं नाक से मांग तक सिंदूर भरती हैं, जो समर्पण, श्रद्धा और जीवनसाथी के प्रति शुभकामना का प्रतीक है।
लाल और नारंगी सिंदूर का अंतर
- लाल सिंदूर: प्रेम, निष्ठा और वैवाहिक सौभाग्य का प्रतीक।
- नारंगी सिंदूर: छठ पूजा में विशेष रूप से प्रयोग होता है, क्योंकि यह सूर्य देव का प्रतीक है और ऊर्जा, पवित्रता व सकारात्मकता का संदेश देता है।
पौराणिक कथाएं
- धीरमति-वीरवान कथा: वीरवान ने धीरमति को जंगली जानवरों से बचाया। बाद में एक लड़ाई में धीरमति ने वीरवान की रक्षा की, और उसके माथे पर खून से सना हाथ गिरा, जिससे नाक और ललाट लाल हो गए। इसे वीरता, प्रेम और पति के प्रति सम्मान का प्रतीक माना गया।
- महाभारत काल की कथा: द्रौपदी ने सभा में अपमानित होने के समय अपनी सिंदूरदानी पलटी, जिससे सिंदूर नाक तक फैल गया। तब से यह सम्मान और सुरक्षा का प्रतीक बन गया।
वैज्ञानिक दृष्टि
नाक से माथे तक का भाग ‘अजना चक्र’ से जुड़ा है, जिसे तीसरी आंख का स्थान भी कहा जाता है। यहां सिंदूर लगाने से मानसिक शांति, ध्यान और सकारात्मक ऊर्जा बढ़ती है। यह मस्तिष्क को शांत रखता है और शरीर में संतुलन लाता है।
निष्कर्ष: छठ पूजा में नाक से मांग तक सिंदूर लगाना सिर्फ धार्मिक आस्था नहीं, बल्कि वैज्ञानिक दृष्टि से भी लाभकारी माना जाता है।