नई दिल्ली। ऑपरेशन ‘सिंदूर’ में हेरॉन Mk-II ड्रोन की सफलता के बाद भारत ने अपनी निगरानी और खुफिया क्षमताओं को और मजबूत करने के लिए इजरायल से इन अत्याधुनिक सैटेलाइट-लिंक्ड ड्रोन की अतिरिक्त खेप खरीदने का निर्णय लिया है। आपातकालीन प्रावधानों के तहत हुए इस समझौते की पुष्टि इजरायल एयरोस्पेस इंडस्ट्रीज (IAI) के एक वरिष्ठ अधिकारी ने की।
तीनों सेनाओं में होगा हेरॉन Mk-II का उपयोग
अधिकारी के अनुसार, हेरॉन Mk-II ड्रोन पहले से ही भारतीय थलसेना और वायुसेना के बेड़े का हिस्सा हैं। नई खरीद के साथ अब नौसेना को भी यह उन्नत प्रणाली उपलब्ध कराई जाएगी, जिससे समुद्री निगरानी क्षमता कई गुना बढ़ जाएगी।
87 MALE ड्रोन की खरीद प्रक्रिया भी जारी
रक्षा मंत्रालय ने सितंबर में 87 मध्यम-ऊंचाई, लंबी उड़ान (MALE) श्रेणी के ड्रोन के लिए RFP जारी किया था।
IAI ने स्पष्ट किया कि यह सौदा ‘मेक इन इंडिया’ पर आधारित होगा और कंपनी भारत में ही हेरॉन का स्वदेशी संस्करण तैयार करने की इच्छुक है। लक्ष्य है कि 60% से अधिक भारतीय कम्पोनेंट्स का उपयोग किया जाए और तकनीक हस्तांतरण को प्राथमिकता दी जाए।
क्या है हेरॉन Mk-II की ताकत?
- 35,000 फीट की ऊंचाई तक उड़ान
- 45 घंटे तक लगातार ऑपरेशन
- दिन–रात इंटेलिजेंस, सर्विलांस और रिकॉनिसेंस (ISR) में सक्षम
- दुनिया की 20 सैन्य इकाइयों में उपयोग
यह ड्रोन दुश्मन की गतिविधियों पर वास्तविक समय में नजर रखने की क्षमता के लिए प्रसिद्ध है।
एयर-टैंकर्स की रेस में केवल इजरायली कंपनी बची
भारत ने छह नए फ्लाइट रिफ्यूलर विमानों की खरीद के लिए भी निविदा जारी की थी। मेक इन इंडिया मानकों—कम से कम 30% इंडीजिनस कंटेंट—के कारण इस दौड़ में अब केवल IAI ही पात्र बची है।
रूसी और यूरोपीय कंपनियाँ इन शर्तों को पूरा नहीं कर पाईं।n सूत्रों के अनुसार, यदि सौदा IAI को मिलता है, तो वह पुराने Boeing–767 विमानों को उन्नत टैंकर एयरक्राफ्ट में बदलकर भारत को दे सकती है।
एयरफोर्स को 15 साल से इंतजार
भारतीय वायुसेना के पास वर्तमान में रूसी IL–78 एयर-टैंकर्स हैं, जो नौसेना और वायुसेना अभियानों में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। पिछले डेढ़ दशक में छह नए रिफ्यूलिंग विमान खरीदने के कई प्रयास बाधित हुए, लेकिन इस बार प्रक्रिया आगे बढ़ने की उम्मीद है।