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1000 साल बाद भी अडिग सोमनाथ, PM मोदी करेंगे दर्शन

नई दिल्ली | सोमनाथ मंदिर—यह नाम केवल एक तीर्थ स्थल का नहीं, बल्कि भारतीय सभ्यता, आस्था और आत्मबल के अमर प्रतीक का प्रतिनिधित्व करता है। गुजरात के प्रभास पाटन में स्थित यह मंदिर भारत के 12 ज्योतिर्लिंगों में प्रथम माना जाता है। वर्ष 2026 सोमनाथ के इतिहास में एक ऐतिहासिक मोड़ लेकर आया है, क्योंकि इस वर्ष 1026 में हुए पहले आक्रमण को 1000 साल पूरे हो रहे हैं।

इसी ऐतिहासिक अवसर पर ‘सोमनाथ स्वाभिमान पर्व’ का आयोजन किया जा रहा है। 8 से 11 जनवरी तक चलने वाले इस कार्यक्रम में धार्मिक, सांस्कृतिक और सामाजिक गतिविधियां होंगी। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी 11 जनवरी को सोमनाथ मंदिर का दौरा करेंगे, जहां वे श्रद्धालुओं के साथ इस गौरवशाली विरासत को नमन करेंगे।

प्रथम ज्योतिर्लिंग और आस्था का केंद्र

सोमनाथ मंदिर का उल्लेख द्वादश ज्योतिर्लिंग स्तोत्र में सबसे पहले आता है— “सौराष्ट्रे सोमनाथं च”,
जो इसे प्रथम ज्योतिर्लिंग का दर्जा देता है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, “सोमलिंगं नरो दृष्ट्वा सर्वपापैः प्रमुच्यते”,
अर्थात जो व्यक्ति सोमनाथ शिवलिंग के दर्शन करता है, वह पापों से मुक्त होकर मोक्ष का अधिकारी बनता है।

समुद्र तट पर स्थित यह मंदिर केवल आध्यात्मिक आस्था का केंद्र ही नहीं, बल्कि प्राचीन भारत की समुद्री, आर्थिक और सांस्कृतिक समृद्धि का भी प्रतीक रहा है। इसी कारण इसकी ख्याति देश-विदेश तक फैली।

1026 का आक्रमण और सभ्यतागत चुनौती

जनवरी 1026 में महमूद गजनवी ने सोमनाथ मंदिर पर आक्रमण किया। इतिहासकारों के अनुसार, इस हमले का उद्देश्य केवल लूट नहीं, बल्कि भारत की धार्मिक और सभ्यतागत पहचान को तोड़ना था। इस दौरान भारी हिंसा हुई, मंदिर को क्षति पहुंचाई गई और नगरवासियों पर अत्याचार किए गए। इस घटना ने उस दौर में पूरे देश के मनोबल को झकझोर दिया।

लेकिन सोमनाथ का इतिहास केवल विनाश की कहानी नहीं है। यह पुनर्निर्माण, संघर्ष और अडिग आस्था की मिसाल भी है। मध्यकाल में कई बार हमले हुए, लेकिन हर बार भारतीय समाज ने सोमनाथ को फिर से खड़ा किया।

पुनर्निर्माण की परंपरा और महान विभूतियों का योगदान

सोमनाथ के पुनर्निर्माण में महारानी अहिल्याबाई होलकर जैसी महान हस्तियों का अहम योगदान रहा। 19वीं सदी के अंत में स्वामी विवेकानंद ने सोमनाथ का दौरा किया और 1897 में चेन्नई में अपने भाषण में कहा कि सोमनाथ जैसे मंदिर भारत के इतिहास और राष्ट्रीय चेतना को पुस्तकों से बेहतर समझाते हैं।

आजादी के बाद ऐतिहासिक निर्णय

1947 में स्वतंत्रता के बाद सरदार वल्लभभाई पटेल सोमनाथ पहुंचे। मंदिर की दुर्दशा देखकर उन्होंने वहीं इसके पुनर्निर्माण की घोषणा कर दी। 11 मई 1951 को भारत के पहले राष्ट्रपति डॉ. राजेंद्र प्रसाद की उपस्थिति में पुनर्निर्मित सोमनाथ मंदिर राष्ट्र को समर्पित किया गया। हालांकि, उस समय के प्रधानमंत्री पंडित जवाहरलाल नेहरू इस कार्यक्रम को लेकर असहज थे, लेकिन डॉ. राजेंद्र प्रसाद अपने निर्णय पर दृढ़ रहे।

इस पूरे अभियान में के.एम. मुंशी की भूमिका अत्यंत महत्वपूर्ण रही। उन्होंने सोमनाथ पर प्रसिद्ध पुस्तक ‘Somanatha: The Shrine Eternal’ लिखी, जो आज भी एक ऐतिहासिक दस्तावेज मानी जाती है।

आज का सोमनाथ: आस्था, उम्मीद और चेतना का प्रतीक

आज, 1000 वर्षों बाद भी सोमनाथ मंदिर उसी समुद्र के किनारे अडिग खड़ा है, जिसकी लहरें मानो यह संदेश देती हैं कि आक्रमणकारी इतिहास में विलीन हो गए, लेकिन आस्था अमर रही। सोमनाथ यह सिखाता है कि नफरत और कट्टरता क्षणिक होती हैं, जबकि विश्वास और सभ्यता शाश्वत।

सोमनाथ मंदिर आज भी भारत को यह प्रेरणा देता है कि यदि वह हजार वर्षों की त्रासदियों के बाद खड़ा रह सकता है, तो भारत भी अपने सभ्यतागत गौरव और आत्मविश्वास के साथ विकसित भारत की दिशा में आगे बढ़ सकता है।

Karuna

infosummerexpress@gmail.com

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