चंडीगढ़। पंजाब एवं हरियाणा हाई कोर्ट ने करीब 50 साल पुराने भूमि विवाद में बड़ा फैसला सुनाते हुए हरियाणा सरकार की 27 वर्ष पुरानी द्वितीय अपील को खारिज कर दिया। अदालत ने स्पष्ट किया कि राज्य की मनमानी या दुर्भावनापूर्ण कार्रवाई किसी नागरिक के वैध रूप से अर्जित भूमि अधिकारों को समाप्त नहीं कर सकती।
जस्टिस वीरेंद्र अग्रवाल ने अपने निर्णय में कहा कि प्रशासनिक और अर्ध-न्यायिक प्राधिकरणों के लिए प्राकृतिक न्याय के सिद्धांतों का पालन करना अनिवार्य है। यह मामला अंबाला जिले के टंगैल गांव की 96 कनाल भूमि से जुड़ा था, जिसे सरकार ने वर्ष 1966 से 1976 तक संत राम, दाता राम और आसा राम सहित वादियों को 10 साल की लीज पर दिया था।
लीज की शर्तों के अनुसार लीज अवधि समाप्त होने के बाद पात्र लाभार्थियों को रियायती दर पर भूमि खरीदने का अधिकार था। वादियों ने वर्ष 1976 में तय प्रक्रिया के तहत 40 रुपये प्रति किल्ला की दर से बिक्री राशि जमा कर जमीन खरीदने का विकल्प अपनाया और इसके बाद उन्हें बिक्री प्रमाणपत्र भी जारी कर दिया गया।
बाद में सरकार ने दलील दी कि जमीन केवल लीज पर दी गई थी और लीज समाप्त होते ही कब्जा अनधिकृत हो गया। सरकार ने यह भी कहा कि वर्ष 1970 में इस जमीन से संबंधित कार्य पुनर्वास विभाग को सौंप दिए गए थे, इसलिए राजस्व अधिकारियों द्वारा जारी बिक्री प्रमाणपत्र वैध नहीं है।
हाई कोर्ट ने पाया कि वर्ष 1989 में, जब मामला सिविल अदालत में लंबित था, तब तहसीलदार (सेल्स) ने वादियों को सुनवाई का अवसर दिए बिना ही भूमि हस्तांतरण का आवेदन खारिज कर दिया। अदालत ने कहा कि “दूसरे पक्ष को भी सुनो” का सिद्धांत प्राकृतिक न्याय का मूल आधार है और इसका उल्लंघन आदेश को अवैध बना देता है।
अदालत ने यह भी उल्लेख किया कि सरकारी रिकॉर्ड में वर्ष 1975 के बयान से स्पष्ट था कि भूमि पर नियमित खेती हो रही थी, फिर भी अधिकारियों ने उपलब्ध रिकॉर्ड की अनदेखी करते हुए विपरीत निष्कर्ष निकाला। हाई कोर्ट ने इसे मनमाना और रिकॉर्ड के खिलाफ आचरण बताया।
अंत में अदालत ने राज्य सरकार की अपील खारिज करते हुए निचली अदालतों के फैसले को बरकरार रखा और कहा कि वैध रूप से प्राप्त भूमि अधिकारों को प्रशासनिक मनमानी के आधार पर खत्म नहीं किया जा सकता।