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14वें दलाई लामा को स्वर्ण सिंहासन अरोहण 86वीं वर्षगांठ पर बोले नोबल पुरस्कार विजेता कैलाश सत्यार्थी

राहुल चावला, धर्मशाला-:हिमाचल प्रदेश के मैक्लोडगंज स्थित चुगलाखंग बौद्ध मठ में रविवार को परमपावन 14वें दलाई लामा के स्वर्ण सिंहासन अरोहण की 86वीं वर्षगांठ श्रद्धा और गरिमा के साथ मनाई गई। इस अवसर पर नोबेल शांति पुरस्कार से सम्मानित कैलाश सत्यार्थी ने कहा कि जब भी उन्हें मैक्लोडगंज आने का अवसर मिलता है, उन्हें ऐसा प्रतीत होता है मानो वे किसी तीर्थ यात्रा पर आए हों। उन्होंने सुझाव दिया कि इस पावन स्थल का नाम ‘दलाई लामा तीर्थ’ रखा जाना चाहिए।

कार्यक्रम को संबोधित करते हुए सत्यार्थी ने कहा कि यह स्थान केवल भौगोलिक दृष्टि से महत्वपूर्ण नहीं, बल्कि आध्यात्मिक ऊर्जा का केंद्र है। उन्होंने कहा कि 86 वर्ष पूर्व 22 फरवरी 1940 को तिब्बत के ऐतिहासिक पोटाला पैलेस में परमपावन को स्वर्ण सिंहासन पर आसीन किया गया था। यह वर्षगांठ केवल एक औपचारिक उत्सव नहीं, बल्कि एक ऐसी ऐतिहासिक और आध्यात्मिक यात्रा का प्रतीक है, जिसने अंधकार को चीरते हुए विश्व को करुणा, सत्य और अहिंसा का संदेश दिया है।सत्यार्थी ने कहा कि दलाई लामा की जीवन यात्रा शीतल नदी की तरह है, जो अन्याय और अत्याचार के पहाड़ों को पार करते हुए पूरी मानवता को प्रेम और सहअस्तित्व का संदेश देती रही है। उन्होंने कहा कि आज के वैश्विक संघर्षों और विभाजन के दौर में दलाई लामा की शिक्षाएं और भी अधिक प्रासंगिक हो गई हैं।

समारोह में तिब्बत की निर्वासित सरकार के प्रधानमंत्री पेम्पा छेरिंग ने भी अपने संबोधन में तिब्बत के भीतर और बाहर रह रहे तिब्बतियों तथा विश्वभर में तिब्बत के समर्थकों को शुभकामनाएं दीं। उन्होंने बताया कि 17 जुलाई 1939 को ल्हामो थोंडुप की पहचान 14वें दलाई लामा के पुनर्जन्म के रूप में हुई थी। इसके बाद वे 8 अक्टूबर 1939 को ल्हासा के नोरबुलिंग्का पैलेस पहुंचे और 22 फरवरी 1940 को पोटाला पैलेस के सिशी फुंटसोक हॉल में उनका औपचारिक राज्याभिषेक संपन्न हुआ।उन्होंने कहा कि यह परंपरा सदियों पुरानी गाडेन फोडरंग व्यवस्था का हिस्सा है, जो तिब्बत के आध्यात्मिक और लौकिक नेतृत्व की निरंतरता का प्रतीक रही है। द्वितीय विश्व युद्ध के कठिन दौर और राजनीतिक चुनौतियों के बावजूद यह प्रक्रिया बिना बाहरी हस्तक्षेप के संपन्न हुई थी।

निर्वासित सरकार की ओर से यह भी रेखांकित किया गया कि परमपावन की चार प्रमुख प्रतिबद्धताएं—मानवीय मूल्यों को बढ़ावा देना, धार्मिक सद्भाव स्थापित करना, तिब्बती संस्कृति और धर्म का संरक्षण तथा प्राचीन भारतीय ज्ञान परंपरा का पुनरुद्धार—आज भी विश्व को दिशा दे रही हैं। कार्यक्रम में विभिन्न देशों से आए प्रतिनिधि, जिनमें फिलीपींस संसद के सदस्य भी शामिल थे, उपस्थित रहे। समारोह श्रद्धा, प्रार्थना और सांस्कृतिक प्रस्तुतियों के साथ संपन्न हुआ।

Chandrika

chandrika@summerexpress.in

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