Summer express/अंबाला-:अंबाला नगर निगम चुनाव के नतीजों का इंतजार अब कुछ ही घंटों का मेहमान है। शहर की राजनीति में इस समय सबसे बड़ा सवाल यही बना हुआ है कि आखिर अंबाला की नई मेयर कौन बनेगी। मतदान संपन्न होने के बाद राजनीतिक दलों के नेताओं, कार्यकर्ताओं और राजनीतिक विश्लेषकों के बीच चर्चाओं का दौर लगातार जारी है, लेकिन इस बार कम मतदान प्रतिशत ने सभी के अनुमान गड़बड़ा दिए हैं। यही कारण है कि कोई भी दल खुलकर जीत का दावा करने से बच रहा है।
नगर निगम चुनाव में लगभग 55 प्रतिशत मतदान दर्ज किया गया। इसके साथ ही मेयर पद के तीन प्रमुख उम्मीदवारों और 65 पार्षद प्रत्याशियों का राजनीतिक भविष्य ईवीएम में कैद हो गया है। अब मतगणना के बाद ही साफ हो पाएगा कि नगर निगम की कमान किसके हाथ में जाएगी और शहर के 20 वार्डों से कौन-कौन पार्षद चुने जाएंगे।चुनाव आयोग के अनुसार नगर निगम क्षेत्र में कुल 1 लाख 98 हजार 224 मतदाता हैं। इनमें 1 लाख 2 हजार 654 पुरुष, 95 हजार 550 महिला और 20 अन्य मतदाता शामिल हैं। मतदान के लिए कुल 191 मतदान केंद्र बनाए गए थे। इस बार सबसे दिलचस्प बात यह रही कि नए जुड़े ग्रामीण वार्डों में मतदान प्रतिशत काफी उत्साहजनक रहा, जबकि शहरी क्षेत्रों में मतदाताओं की भागीदारी अपेक्षा से कम दिखाई दी।वार्ड नंबर 1 में सबसे अधिक 86.96 प्रतिशत मतदान दर्ज किया गया, जबकि वार्ड नंबर 6 में सबसे कम 46.86 प्रतिशत वोट पड़े। राजनीतिक हलकों में इस कम मतदान को लेकर अलग-अलग समीकरण लगाए जा रहे हैं। कई राजनीतिक जानकारों का मानना है कि शहरी इलाकों में कम मतदान का असर भाजपा पर पड़ सकता है, क्योंकि पार्टी का पारंपरिक आधार शहर क्षेत्रों में मजबूत माना जाता रहा है।
पिछले कुछ चुनावी आंकड़े भी इस चर्चा को बल दे रहे हैं। लोकसभा और विधानसभा चुनावों में भाजपा को अंबाला शहर क्षेत्र में अपेक्षित सफलता नहीं मिली थी। हालांकि इसके बाद हुए मेयर उपचुनाव में भाजपा ने बड़ी जीत हासिल की थी, लेकिन उस जीत के बावजूद शहर में विकास को लेकर जनता में विशेष संतोष नजर नहीं आया। विपक्ष लगातार भाजपा पर वादों को पूरा न करने और आंतरिक गुटबाजी का आरोप लगाता रहा है।
इस बार भाजपा ने चुनाव प्रचार में “ट्रिपल इंजन सरकार” का मुद्दा प्रमुखता से उठाया। पार्टी नेताओं ने दावा किया कि केंद्र, राज्य और नगर निगम में एक ही दल की सरकार बनने से विकास कार्यों को तेजी मिलेगी। दूसरी ओर कांग्रेस ने भाजपा के इन दावों को खोखला बताते हुए जनता के बीच स्थानीय समस्याओं को प्रमुखता से उठाया। कांग्रेस नेताओं ने सफाई व्यवस्था, सड़कों, जलभराव और मूलभूत सुविधाओं के मुद्दे पर भाजपा को घेरने का प्रयास किया।राजनीतिक तौर पर इस बार कांग्रेस पहले की तुलना में ज्यादा संगठित दिखाई दी। पिछले चुनावों में गुटबाजी से जूझने वाली कांग्रेस ने लोकसभा और विधानसभा चुनावों में बेहतर प्रदर्शन के बाद संगठनात्मक मजबूती दिखाई। यही वजह रही कि पार्टी कार्यकर्ताओं ने इस चुनाव में एकजुट होकर प्रचार किया।
भाजपा के सामने सबसे बड़ी चुनौती पार्टी के भीतर की नाराजगी रही। टिकट वितरण से असंतुष्ट कई नेताओं ने निर्दलीय उम्मीदवार के रूप में मैदान में उतरकर मुकाबले को और रोचक बना दिया। भाजपा के आठ बागी प्रत्याशी चुनाव लड़ रहे हैं,जिन्हें पार्टी ने छह साल के लिए निष्कासित कर दिया है। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि इन बागियों का असर कई वार्डों में परिणाम बदल सकता है।इस चुनाव में निर्दलीय मेयर प्रत्याशी सोनिया चौधरी ने भी सबका ध्यान आकर्षित किया। बिना बड़े संगठन के चुनाव लड़ते हुए उन्होंने मजबूत प्रचार अभियान चलाया। उनके पति विजय चौधरी भी वार्ड नंबर 3 से निर्दलीय उम्मीदवार के रूप में मैदान में हैं। बाद में इनेलो, आम आदमी पार्टी और बसपा ने सोनिया चौधरी को समर्थन देकर मुकाबले को त्रिकोणीय बना दिया। माना जा रहा है कि भाजपा और कांग्रेस से नाराज मतदाताओं का समर्थन भी उन्हें मिल सकता है।मेयर पद के मुख्य मुकाबले में भाजपा की अक्षिता शर्मा, कांग्रेस की कुलविंद्र कौर और बसपा-आप-इनेलो समर्थित निर्दलीय प्रत्याशी सोनिया चौधरी प्रमुख दावेदार मानी जा रही हैं। अब सभी की निगाहें मतगणना पर टिकी हैं, जहां यह तय होगा कि अंबाला की नई प्रथम नागरिक कौन बनेगी।