Summer express, करनाल। हरियाणा के करनाल जिले में खाद्य, नागरिक आपूर्ति एवं उपभोक्ता मामले विभाग की कार्यप्रणाली एक बार फिर चर्चा में है। गेहूं खरीद सीजन के दौरान प्रशासनिक जरूरतों के नाम पर अन्य जिलों से अस्थायी तौर पर बुलाए गए अधिकारियों को निर्धारित अवधि पूरी होने के बाद भी वापस नहीं भेजा गया है। वहीं करोड़ों रुपये मूल्य के सरकारी धान के कथित गबन और उससे जुड़े मामलों में कार्रवाई में हुई देरी को लेकर भी विभाग की कार्यशैली पर सवाल उठ रहे हैं।
विभागीय रिकॉर्ड के अनुसार 18 मार्च को जारी आदेशों के तहत प्रदेश के विभिन्न जिलों से नौ अधिकारियों और कर्मचारियों को 60 दिनों के लिए करनाल में अस्थायी तौर पर तैनात किया गया था। इनमें कुरुक्षेत्र, पानीपत, सिरसा, पलवल और जींद से आए अधिकारी शामिल थे। निर्धारित अवधि मई माह में पूरी हो चुकी थी, लेकिन तीन महीने बीतने के बाद भी इनमें से अधिकांश अधिकारियों की मूल जिलों में वापसी को लेकर कोई स्पष्ट आदेश जारी नहीं किया गया है।
इस मामले में विभाग के रवैये को लेकर भी सवाल खड़े हो रहे हैं। सूची में शामिल एक अधिकारी को व्यक्तिगत कारणों के आधार पर समय रहते उनके मूल जिले में वापस भेज दिया गया, जबकि अन्य अधिकारियों के संबंध में अब तक कोई निर्णय सामने नहीं आया है। इससे विभागीय स्तर पर पारदर्शिता और समानता को लेकर चर्चाएं तेज हो गई हैं।
इसी बीच तरावड़ी क्षेत्र की दो राइस मिलों से लगभग 26 हजार क्विंटल सरकारी धान के कथित रूप से गायब होने का मामला भी विभाग के लिए चिंता का विषय बना हुआ है। उपलब्ध जानकारी के अनुसार इस धान की अनुमानित बाजार कीमत करीब 13 करोड़ रुपये बताई जा रही है। बताया जाता है कि खरीद के बाद भौतिक सत्यापन की प्रक्रिया समय पर पूरी हो गई थी, लेकिन संबंधित मिल संचालकों के खिलाफ कानूनी कार्रवाई शुरू करने में कई महीने लग गए। इस देरी को लेकर विभाग की जवाबदेही पर भी सवाल उठाए जा रहे हैं।
विवादों के बीच गेहूं खरीद व्यवस्था में अधिकारियों की तैनाती को लेकर भी चर्चा बनी हुई है। मंडी क्षेत्र में महत्वपूर्ण जिम्मेदारियां ऐसे अधिकारी को सौंपे जाने पर सवाल उठे हैं, जिसके खिलाफ पहले से भ्रष्टाचार से जुड़े मामले दर्ज होने की बात कही जा रही है। वहीं कुछ अन्य अधिकारियों की खरीद प्रक्रिया में सीमित भूमिका और बार-बार हुए प्रशासनिक फेरबदल को लेकर भी विभाग की कार्यशैली पर उंगलियां उठ रही हैं।
लगातार सामने आ रहे इन मामलों ने करनाल के खाद्य एवं आपूर्ति विभाग की कार्यप्रणाली को चर्चा के केंद्र में ला दिया है। विभाग की ओर से अब तक इन आरोपों और सवालों पर कोई विस्तृत आधिकारिक प्रतिक्रिया सामने नहीं आई है। ऐसे में प्रशासनिक निर्णयों, अधिकारियों की तैनाती और लंबित मामलों में कार्रवाई की पारदर्शिता को लेकर बहस तेज हो गई है।