ज्यादा अंक के बावजूद जूनियर रखे गए कर्मचारियों को 27 साल बाद सीनियोरिटी का लाभ; सरकार को दो महीने
की मोहलत
समर न्यूज | चंडीगढ़
पंजाब राज्य योजना बोर्ड के कर्मचारियों की सीनियोरिटी और प्रमोशन से जुड़ा करीब 25 साल पुराना विवाद पंजाब एवं हरियाणा हाईकोर्ट के फैसले के साथ खत्म हुआ। अदालत ने याचिकाकर्ताओं को 25 नवंबर 1999 से सीनियोरिटी और प्रमोशन के सभी परिणामी लाभ देने का आदेश दिया है।
साथ ही पेंशन और सेवानिवृत्ति लाभ की दोबारा गणना कर बकाया राशि का भुगतान करने को कहा है। सरकार को आदेश लागू करने के लिए दो महीने का समय दिया गया है। विवाद 1991 में तकनीकी सहायक के पदों पर सीधी भर्ती से शुरू हुआ। चयन नियमों के अनुसार उम्मीदवारों की सीनियोरिटी चयन बोर्ड की परीक्षा में प्राप्त अंकों के आधार पर तय होनी थी। इसी दौरान उद्योग विभाग के सरप्लस कर्मचारियों को पहले इन पदों पर समायोजित करने के निर्देश दिए गए। विभागीय स्तर पर हुई चूक के कारण याचिकाकर्ताओं के नाम समय पर सरप्लस सूची में शामिल नहीं किए गए।
बाद में सामने आया कि याचिकाकर्ताओं ने उन कर्मचारियों से अधिक अंक हासिल किए थे, जिन्हें उनसे पहले समायोजित किया गया था। इसके बावजूद 1999 में उन्हीं जूनियर कर्मचारियों को
रिसर्च अफसर पद पर पदोन्नति दे दी गई। 2000 की सीनियोरिटी सूची में भी याचिकाकर्ताओं को उनसे नीचे रखा गया।
हाईकोर्ट में पहुंचा मामला: याचिकाकर्ताओं ने 2001 में हाईकोर्ट का रुख किया। उनका तर्क था कि अधिक अंक होने के बावजूद उन्हें कम सीनियर माना जाना नियमों के विपरीत है। लंबी कानूनी प्रक्रिया के दौरान सभी याचिकाकर्ता सेवानिवृत्त हो गए। बाद में उन्हें रिसर्च अफसर के पद पर पदोन्नति तो मिली, लेकिन पुरानी सीनियोरिटी के आधार पर मिलने वाले वित्तीय लाभ नहीं मिले।
सरप्लस कर्मचारियों पर टिप्पणी: हाईकोर्ट ने कहा कि सरप्लस कर्मचारियों को समायोजन में प्राथमिकता दी जा सकती है, लेकिन इससे उन्हें मेरिट सूची में ऊपर रखने का अधिकार नहीं मिल जाता। अदालत ने सरकार को सीनियोरिटी और प्रमोशन का लाभ पूर्व प्रभाव से देने के साथ पेंशन तथा अन्य सेवानिवृत्ति लाभों का पुनर्गणना करने का निर्देश दिया।