Summer express/कांगड़ा, राहुल-:हिमाचल प्रदेश में गिद्धों के संरक्षण को लेकर किए जा रहे प्रयास अब सकारात्मक परिणाम दिखाने लगे हैं। कांगड़ा जिला संकटग्रस्त गिद्ध प्रजातियों के संरक्षण के लिहाज से महत्वपूर्ण क्षेत्र बनकर उभरा है। वन विभाग की ओर से किए गए सर्वे में यहां वाइट-रम्प्ड वल्चर की सबसे अधिक ज्ञात संख्या दर्ज की गई है। यह प्रजाति अंतरराष्ट्रीय स्तर पर गंभीर रूप से संकटग्रस्त यानी आईयूसीएन की क्रिटिकली एंडेंजर्ड श्रेणी में शामिल है। कांगड़ा में बड़ी संख्या में इन गिद्धों की मौजूदगी को संरक्षण प्रयासों के लिए उत्साहजनक संकेत माना जा रहा है।
DFO वाइल्ड लाइफ धर्मशाला संजीव सिंह के मुताबिक गिद्धों की संख्या और उनके आवास की निगरानी के लिए लगातार सर्वे किए जा रहे हैं। साथ ही वन्यजीव संरक्षण कानूनों का प्रभावी पालन, विभागों के बीच समन्वय और स्थानीय लोगों की भागीदारी भी सुनिश्चित की जा रही है। इन्हीं प्रयासों के चलते गिद्ध संरक्षण को लेकर बेहतर परिणाम सामने आ रहे हैं।दुनिया में गिद्धों की कुल 23 प्रजातियां पाई जाती हैं, जिनमें से 9 प्रजातियां भारत में मौजूद हैं। हिमाचल प्रदेश में नियमित रूप से पांच प्रजातियां देखी जाती हैं, जबकि चार प्रजातियां प्रवासी हैं। भारत में पाई जाने वाली नौ प्रजातियों में से चार को आईयूसीएन ने क्रिटिकली एंडेंजर्ड श्रेणी में रखा है। इनमें वाइट-रम्प्ड वल्चर, रेड-हेडेड वल्चर, इंडियन वल्चर और स्लेंडर-बिल्ड वल्चर शामिल हैं।हिमाचल में नियमित रूप से मिलने वाली प्रमुख प्रजातियों में वाइट-रम्प्ड वल्चर के अलावा हिमालयन ग्रिफन, यूरेशियन ग्रिफन, बियर्डेड और इजिप्शियन वल्चर शामिल हैं। कांगड़ा और चंबा के निचले इलाकों में करीब 17 ऐसे स्थान चिन्हित किए गए हैं, जहां गिद्धों की मौजूदगी दर्ज की गई है।
DFO के अनुसार अब तक के सर्वे में वाइट-रम्प्ड वल्चर की सबसे अधिक ज्ञात संख्या कांगड़ा जिले में सामने आई है। हालांकि नेपाल से संबंधित आंकड़े अभी उपलब्ध नहीं हुए हैं। ऐसे में अंतिम तुलना बाद में स्पष्ट होगी। इसके बावजूद कांगड़ा में इस संकटग्रस्त प्रजाति की बड़ी मौजूदगी संरक्षण के लिहाज से अहम उपलब्धि मानी जा रही है।गिद्धों के घोंसलों और उनके आवास को सुरक्षित रखने के लिए भी वन विभाग विशेष सावधानी बरत रहा है। घोंसले वाले पेड़ों को साल्वेज लॉट की मार्किंग से बाहर रखने का प्रयास किया जाता है। आसपास के सूखे पेड़ों की मार्किंग में भी जरूरत के अनुसार सावधानी बरती जाती है, ताकि पेड़ों की कटाई के दौरान गिद्धों के घोंसलों को नुकसान न पहुंचे।फायर सीजन में भी गिद्धों के आवास वाले क्षेत्रों में विशेष सतर्कता बरतने के निर्देश दिए जाते हैं। वन विभाग के टेरिटोरियल विंग और हिमाचल प्रदेश स्टेट फॉरेस्ट कॉरपोरेशन का सहयोग भी संरक्षण कार्यों में अहम भूमिका निभा रहा है।