समर न्यूज। रोपड़
राष्ट्रीय हरित अधिकरण (एनजीटी) ने हिमाचल प्रदेश की सिरसा नदी में कथित प्रदूषण और उसके पंजाब के रोपड़ क्षेत्र में सतलुज पर पड़ रहे असर का संज्ञान लिया है। अधिकरण ने मामले को पर्यावरणीय मानकों के अनुपालन से जुड़ा गंभीर मुद्दा मानते हुए हिमाचल प्रदेश और हरियाणा समेत संबंधित पक्षों को नोटिस जारी किया है।
मामले की अगली सुनवाई 2 दिसंबर को होगी। यह कार्रवाई रोपड़ से आम आदमी पार्टी के विधायक दिनेश चड्ढा की ओर से दायर आवेदन पर हुई है। एनजीटी अध्यक्ष न्यायमूर्ति प्रकाश श्रीवास्तव और विशेषज्ञ सदस्य डॉ. अफरोज अहमद की पीठ ने 9 सितंबर को मामले की सुनवाई की। आवेदन में आरोप लगाया गया है कि हिमाचल के बद्दी-बरोटीवाला-नालागढ़ औद्योगिक क्षेत्र से निकलने वाला अनुपचारित या आंशिक रूप से उपचारित औद्योगिक अपशिष्ट नालों और जलधाराओं के जरिये सिरसा नदी में पहुंच रहा है। आगे यह नदी सतलुज में मिलती है, जिससे रोपड़ क्षेत्र में पानी की गुणवत्ता प्रभावित होने की आशंका जताई गई है। पंजाब प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड के जुलाई 2025 से मार्च 2026 तक के नमूना परीक्षण में घनौली के पास सिरसा नदी की स्थिति चिंताजनक पाई गई।
मार्च 2026 में कुल कोलीफॉर्म 60,000 एमपीएन प्रति 100 मिलीलीटर और फीकल कोलीफॉर्म 17,000 एमपीएन प्रति 100 मिलीलीटर तक पहुंच गया। निर्धारित मानक की तुलना में फीकल कोलीफॉर्म का स्तर करीब 34 गुना अधिक था। दिसंबर 2025 में जैव रासायनिक ऑक्सीजन मांग भी 15 मिलीग्राम प्रति लीटर तक पहुंची थी।
{उद्योग और सीवेज पर उठे सवाल – विधायक ने दावा किया है कि बद्दी क्षेत्र में करीब 2,200 उद्योग हैं, जिनमें लगभग 1,000 इकाइयां तरल अपशिष्ट पैदा करती हैं, जबकि करीब 377 इकाइयों का अपशिष्ट साझा अपशिष्ट उपचार संयंत्र तक पहुंचता है। उन्होंने घरेलू सीवेज के अपर्याप्त उपचार का मुद्दा भी उठाया है। हालांकि, इन दावों की जिम्मेदारी और वास्तविक स्रोत की पुष्टि जांच के बाद ही हो सकेगी।
एफआईआर के बाद एनजीटी तक मामला
इससे पहले रोपड़ में सतलुज के हेडवर्क्स के पास औद्योगिक कचरा और अन्य संदिग्ध सामग्री जमा होने के बाद अज्ञात औद्योगिक इकाइयों के खिलाफ एफआईआर दर्ज हुई थी। प्रदूषण नियंत्रण अधिकारियों ने नमूने लिए और स्रोत का पता लगाने के लिए हिमाचल प्रदेश के संबंधित क्षेत्रों तक जांच का मुद्दा उठाया था। एनजीटी ने संबंधित पक्षों को अगली सुनवाई से कम से कम एक सप्ताह पहले सेवा-शपथपत्र दाखिल करने का निर्देश दिया है। अब निगाह इस बात पर है कि जांच में प्रदूषण के वास्तविक स्रोत, उपचार व्यवस्था और सतलुज तक पहुंच रहे प्रदूषण की जिम्मेदारी किसकी तय होती है।