Summer express, चंडीगढ़ I हरियाणा के कई शहरों में निर्माण कार्यों से निकलने वाले मलबे के उचित निस्तारण की व्यवस्था अब भी अधूरी है। कहीं मलबा खुले में फेंका जा रहा है तो कहीं प्लांट लगाने के लिए जमीन चिह्नित होने के बावजूद परियोजना आगे नहीं बढ़ पा रही है। इससे शहरों की सफाई व्यवस्था प्रभावित होने के साथ पर्यावरण प्रदूषण की समस्या भी बढ़ रही है। वहीं, स्वच्छ सर्वेक्षण में शहरों की रैंकिंग पर भी इसका प्रतिकूल असर पड़ने की आशंका है। इस समस्या से निपटने के लिए मानेसर, सोनीपत और पानीपत में निर्माण मलबे के निस्तारण के लिए प्लांट स्थापित करने की तैयारी की जा रही है। इन तीनों प्लांटों की कुल क्षमता 450 टन प्रतिदिन होगी।
मानेसर में होंडा इंडिया फाउंडेशन कॉर्पोरेट सामाजिक उत्तरदायित्व (सीएसआर) के तहत 300 टन प्रतिदिन क्षमता वाला प्लांट स्थापित करेगी। इस संबंध में नगर निगम और कंपनी के बीच समझौता हो चुका है। परियोजना के लिए नगर निगम चार एकड़ जमीन उपलब्ध कराएगा, जबकि प्लांट के निर्माण पर होने वाला पूरा खर्च कंपनी वहन करेगी। सभी आवश्यक अनापत्ति प्रमाण पत्र (एनओसी) समय पर मिल जाने पर अगले वर्ष मार्च-अप्रैल तक प्लांट तैयार होने की उम्मीद है।
सोनीपत में 100 टन और पानीपत में 50 टन प्रतिदिन क्षमता वाले प्लांट स्थापित किए जाने की योजना है। सोनीपत में गांव रेवली के पास करीब 10 एकड़ जमीन चिह्नित की गई है। इस परियोजना पर लगभग नौ करोड़ रुपये खर्च होने का अनुमान है। प्लांट के निर्माण और संचालन से संबंधित कार्य के लिए तीन एजेंसियों ने रुचि दिखाई है।
वहीं, पानीपत में प्लांट स्थापित करने के लिए बिंझौल डेयरी, निंबरी और बरसत रोड के आसपास संभावित स्थानों की पहचान की गई है। फिलहाल संबंधित अधिकारी परियोजना की रूपरेखा तैयार करने में जुटे हैं।
प्रदेश के कई अन्य शहरों में निर्माण मलबे के निस्तारण की स्थिति संतोषजनक नहीं है। हिसार और रोहतक में प्लांट के लिए जमीन चिह्नित किए जाने के बावजूद परियोजनाओं पर काम आगे नहीं बढ़ पाया है। रेवाड़ी के मनेठी में प्लांट मौजूद होने के बाद भी उसका संचालन प्रभावी ढंग से नहीं हो रहा है। सिरसा में संबंधित एजेंसी की कार्यप्रणाली भी अपेक्षाओं के अनुरूप नहीं बताई जा रही है। इसके अलावा फतेहाबाद, भिवानी और चरखी दादरी में अब तक प्लांट स्थापित करने के लिए जमीन तय नहीं हो पाई है।
अंबाला में 32 टन प्रतिदिन क्षमता का प्लांट स्थापित करने के लिए 3.68 करोड़ रुपये की निविदा जारी की गई है। दूसरी ओर, बहादुरगढ़ में प्रतिदिन करीब 2.5 टन निर्माण मलबा अलग-अलग निचले इलाकों में डाल दिया जाता है। नारनौल में गांव रघुनाथपुरा में प्लांट स्थापित करने के लिए प्रस्ताव तैयार किया गया है।
निर्माण मलबे का खुले में पड़ा रहना केवल सफाई व्यवस्था के लिए ही नहीं, बल्कि लोगों के स्वास्थ्य के लिए भी गंभीर चुनौती है। पर्यावरण विश्लेषक सुनील दहिया के अनुसार, खुले में जमा निर्माण मलबे से उड़ने वाली धूल हवा की गुणवत्ता को खराब करती है और सांस के जरिए लोगों के फेफड़ों तक पहुंच सकती है। इसके अलावा, मलबे के ढेर पर अन्य प्रकार का कचरा जमा होने से आसपास गंदगी बढ़ती है।
उन्होंने बताया कि वैज्ञानिक तकनीक के माध्यम से निर्माण मलबे को संसाधित कर दोबारा इस्तेमाल योग्य बनाया जा सकता है। इससे एक ओर कचरे के उचित निस्तारण में मदद मिलेगी, वहीं दूसरी ओर पुनर्चक्रित सामग्री के उपयोग से नई निर्माण सामग्री की मांग भी कम की जा सकेगी। इसके लिए जरूरी है कि शहरों में मलबा एकत्र करने, उसे प्लांट तक पहुंचाने और वैज्ञानिक तरीके से संसाधित करने की व्यवस्था प्रभावी बनाई जाए।