Summer express, फरीदाबाद (अनिल मंगला)। फरीदाबाद के बादशाह खान (बीके) नागरिक अस्पताल में महीनों से खड़ी चार एंबुलेंसों के नाम पर करीब 50 लाख रुपये का डीजल खरीदे जाने का मामला सामने आया है। विभागीय रिकॉर्ड में इन एंबुलेंसों के फ्यूल कार्ड से लगातार डीजल भरवाने की एंट्रियां मिली हैं, जबकि संबंधित वाहन लंबे समय से एक ही स्थान पर खड़े थे या वर्कशॉप में थे। मामला उजागर होने के बाद स्वास्थ्य विभाग ने जांच शुरू कर दी है। सिविल सर्जन डॉ. जयंत आहूजा ने 20 अक्टूबर को जांच कमेटी गठित कर 15 दिन के भीतर रिपोर्ट सौंपने के निर्देश दिए हैं। उन्होंने कहा है कि जांच में जो भी दोषी पाया जाएगा, उसके खिलाफ कार्रवाई की जाएगी।
मामले को लेकर राष्ट्रीय स्वास्थ्य मिशन (एनएचएम) के निदेशक वीरेंद्र यादव भी नजर बनाए हुए हैं। सोमवार को बीके अस्पताल के दौरे के दौरान उन्होंने कहा कि मामले की जांच के लिए कमेटी बनाई गई है। जांच रिपोर्ट मिलने के बाद तथ्यों के आधार पर आगे की कार्रवाई की जाएगी।
इस मामले पर हरियाणा के पूर्व उपमुख्यमंत्री दुष्यंत चौटाला ने भी सवाल उठाए हैं। उन्होंने अपने फेसबुक अकाउंट पर पोस्ट साझा कर सरकार और स्वास्थ्य विभाग की कार्यप्रणाली पर निशाना साधा। उन्होंने लिखा कि प्रदेश में अजीब स्थिति है, जहां खड़ी एंबुलेंसों के नाम पर 50 लाख रुपये का डीजल खर्च दिखाया जा रहा है। उन्होंने यह भी सवाल उठाया कि प्रदेश में इस तरह की और कितनी घटनाएं हो रही होंगी। दुष्यंत चौटाला ने आरोप लगाया कि छोटे कर्मचारियों पर कार्रवाई कर बड़े अधिकारियों को बचाने की कोशिश की जा रही है।
विभागीय जानकारी के अनुसार, कुछ महीने पहले पंचकूला स्थित मुख्यालय ने एंबुलेंसों में फ्यूल कार्ड के जरिए होने वाले लेनदेन की जांच की थी। इस दौरान पता चला कि कुछ एंबुलेंसों के नाम पर पेट्रोल पंप से डीजल खरीदा जा रहा था, जबकि वे चल ही नहीं रही थीं। रिकॉर्ड में एक-दो बार नहीं, बल्कि लगातार ईंधन भरवाने की एंट्रियां दर्ज मिलीं। प्रारंभिक जांच में करीब 50 लाख रुपये के डीजल की खरीद का अंदेशा जताया गया है। खास बात यह है कि जिन तारीखों में ईंधन भरवाने का रिकॉर्ड मिला, उस अवधि में संबंधित एंबुलेंस अपनी निर्धारित जगह से नहीं निकली थीं।
जिन चार एंबुलेंसों के नाम पर डीजल की एंट्रियां दर्ज मिली हैं, उनमें HR38GV3491 और HR38GV9863 नंबर की दो एंबुलेंस शामिल हैं। ये दोनों वाहन तीन से चार महीने से अस्पताल की मोर्चरी के पास खड़े थे। इसके बावजूद 11 अक्टूबर तक इनके फ्यूल कार्ड से डीजल भरवाने का रिकॉर्ड मिला है। इसी तरह HR38Z0951 और HR38GV1670 नंबर की दो अन्य एंबुलेंस जनवरी और अगस्त से एजेंसी की वर्कशॉप में खड़ी थीं। इनके फ्यूल कार्ड से भी 16 सितंबर और 11 अक्टूबर तक डीजल भरवाने की एंट्रियां दर्ज पाई गईं।
मामले में डिप्टी सिविल सर्जन (एनएचएम) विनय गुप्ता ने 16 अक्टूबर को आरटीएस फ्लीट मैनेजर को कारण बताओ नोटिस जारी किया था। नोटिस के जरिए डीजल खरीद और फ्यूल कार्ड से हुए लेनदेन का पूरा ब्योरा मांगा गया। इसमें प्रत्येक एंबुलेंस के लिए डीजल भरवाने की तारीख, ईंधन की मात्रा, खर्च की गई राशि, संबंधित पेट्रोल पंप और लेनदेन के लिए जिम्मेदार कर्मचारियों के नाम उपलब्ध कराने के निर्देश दिए गए थे।
इसके बाद सिविल सर्जन डॉ. जयंत आहूजा ने 20 अक्टूबर को जांच कमेटी गठित कर 15 दिन में रिपोर्ट देने को कहा। कमेटी को मामले से जुड़े रिकॉर्ड और लेनदेन की जांच कर जिम्मेदारी तय करनी है। विभाग का कहना है कि रिपोर्ट मिलने के बाद नियमानुसार कार्रवाई की जाएगी।
इस मामले ने स्वास्थ्य विभाग की निगरानी व्यवस्था पर कई सवाल खड़े कर दिए हैं। जब एंबुलेंस महीनों से अस्पताल परिसर या वर्कशॉप में खड़ी थीं, तो उनके नाम पर डीजल की खरीद कैसे होती रही? फ्यूल कार्ड से हुए लेनदेन का सत्यापन किस स्तर पर किया गया? बिना चले वाहनों के नाम पर ईंधन भरवाने की एंट्रियां लगातार दर्ज होने के बावजूद किसी अधिकारी का ध्यान इस ओर क्यों नहीं गया? फिलहाल इन सवालों के जवाब जांच कमेटी की रिपोर्ट के बाद ही स्पष्ट हो सकेंगे।