2 July,2025
संत रविदास, जिन्हें भक्तिकाल के महान संतों में गिना जाता है, आज भी अपनी वाणी और विचारों से समाज को दिशा दिखा रहे हैं। उनकी रचनाएं न केवल आध्यात्मिक ऊर्जा से भरपूर हैं, बल्कि सामाजिक समरसता और मानव समानता का स्पष्ट संदेश देती हैं।
“मन चंगा तो कठौती में गंगा” – यह प्रसिद्ध पंक्ति संत रविदास की उस सोच को दर्शाती है जिसमें बाहरी आडंबर की अपेक्षा आंतरिक पवित्रता को अधिक महत्व दिया गया है। उनका जीवन और वाणी दोनों ही सामाजिक न्याय, जाति-भेद के विरुद्ध संघर्ष और एक ईश्वर की उपासना की प्रेरणा हैं।
संत रविदास की वाणी आज भी गुरुग्रंथ साहिब में स्थान पाती है, जो उनके विचारों की महानता को दर्शाता है। उनकी वाणी का मूल संदेश है – “ऐसा चाहूँ राज मैं, जहाँ मिले सबन को अन्न। छोट-बड़ो सब सम बसै, रविदास रहे प्रसन्न॥”
वाराणसी, जो उनका जन्मस्थान है, आज भी उनकी स्मृति में भक्ति की भावना से ओत-प्रोत है। हर वर्ष माघ पूर्णिमा को उनकी जयंती भव्य रूप से मनाई जाती है। देशभर से लाखों श्रद्धालु उनकी जन्मभूमि पर पहुंचते हैं और उनकी वाणी का पाठ करते हैं।
समाज के लिए संदेश:
संत रविदास की वाणी न केवल धार्मिक दृष्टिकोण से महत्वपूर्ण है, बल्कि सामाजिक न्याय, समानता, और मानवता की प्रेरणा भी देती है। आज जब समाज अनेक प्रकार के भेदभावों से जूझ रहा है, संत रविदास की वाणी एक दीपक की तरह अंधकार में प्रकाश फैलाने का कार्य कर रही है।संत रविदास केवल एक संत नहीं थे, वे एक विचारधारा थे – जो आज भी जीवंत है, और आने वाली पीढ़ियों के लिए एक मार्गदर्शक बनी हुई है।