Summer express, नई दिल्ली। भारत में सोना केवल निवेश का माध्यम नहीं, बल्कि पारिवारिक परंपरा और भावनाओं से जुड़ी संपत्ति माना जाता है। बदलते ट्रेंड के चलते लोग अक्सर पुराने गहनों के बदले नए डिजाइन के आभूषण बनवा लेते हैं, लेकिन बहुत कम लोग जानते हैं कि ऐसा करना कई बार टैक्स के दायरे में भी आ सकता है।
टैक्स विशेषज्ञों के अनुसार पुराने गहनों का एक्सचेंज सिर्फ डिजाइन बदलना नहीं माना जाता, बल्कि आयकर नियमों के तहत इसे संपत्ति के हस्तांतरण यानी ‘एसेट ट्रांसफर’ की श्रेणी में रखा जा सकता है। ऐसे में पुराने सोने की कीमत बढ़ने पर कैपिटल गेन टैक्स लागू हो सकता है।
विशेषज्ञ बताते हैं कि यदि किसी व्यक्ति ने कई साल पहले कम कीमत पर सोना खरीदा था और अब उसकी बाजार कीमत काफी बढ़ चुकी है, तो एक्सचेंज के दौरान उस मूल्य वृद्धि पर टैक्स बन सकता है। भले ही उपभोक्ता को सीधे नकद राशि न मिले, लेकिन आयकर विभाग इसे संपत्ति के लेनदेन के रूप में देख सकता है।
पुश्तैनी गहनों के मामले में यह प्रक्रिया और जटिल हो जाती है। अधिकतर परिवारों के पास पुराने आभूषणों की खरीद से जुड़े दस्तावेज या वास्तविक कीमत का रिकॉर्ड नहीं होता। ऐसे में टैक्स की गणना करना चुनौतीपूर्ण हो सकता है। अगर गहने विरासत, गिफ्ट या वसीयत के जरिए मिले हों, तब भी पुराने मालिक की खरीद कीमत को आधार मानकर टैक्स तय किया जा सकता है।
विशेषज्ञों के मुताबिक 1 अप्रैल 2001 की वैल्यू ऐसे मामलों में अहम भूमिका निभाती है। कई बार इसी तारीख के बाजार मूल्य को आधार बनाकर कैपिटल गेन की गणना की जाती है। इसलिए केवल पुराने गहनों का डिजाइन बदलवाना भी भविष्य में टैक्स संबंधी परेशानी खड़ी कर सकता है।
वर्तमान में ज्यादातर ज्वेलर्स पुराने गहनों के बदले नए डिजाइन उपलब्ध करा रहे हैं, लेकिन बिना उचित रिकॉर्ड और सही वैल्यूएशन के यह कदम बाद में आर्थिक बोझ बढ़ा सकता है। टैक्स सलाहकारों का कहना है कि एक्सचेंज से पहले खरीद तारीख, मूल्यांकन और संबंधित दस्तावेजों की जांच जरूर कर लेनी चाहिए, ताकि भविष्य में किसी टैक्स नोटिस या अतिरिक्त देनदारी से बचा जा सके।