summer express ,नई दिल्ली। तिब्बत में हिमस्खलन के बाद नेपाल में आई भीषण बाढ़ ने हिमालयी क्षेत्र में आपदा प्रबंधन और निगरानी तंत्र को लेकर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। विशेषज्ञों के अनुसार, हिमालय में बढ़ती प्राकृतिक आपदाएं भारत के लिए भी बड़ी चेतावनी हैं। यदि हिमस्खलन या ग्लेशियर से उत्पन्न सैलाब की दिशा में थोड़ा भी बदलाव होता, तो इसका असर भारतीय क्षेत्रों में भी दिखाई दे सकता था।
जलवायु परिवर्तन और तेजी से हो रहे निर्माण कार्यों के कारण हिमालय का नाजुक पारिस्थितिकी तंत्र लगातार दबाव में है। भारत के हिमालयी क्षेत्र में 2,431 ग्लेशियर झीलों की पहचान की गई है, जिनमें से 676 के आकार में उल्लेखनीय वृद्धि दर्ज की गई है। राष्ट्रीय आपदा प्रबंधन प्राधिकरण (एनडीएमए) और केंद्रीय जल आयोग ने 189 ग्लेशियर झीलों को उच्च जोखिम वाली श्रेणी में रखा है। इनमें 56 झीलों को बेहद संवेदनशील माना गया है।
भारत प्राकृतिक आपदाओं की निगरानी के लिए अंतरिक्ष आधारित तकनीक में लगातार क्षमता बढ़ा रहा है। इसरो के नेशनल रिमोट सेंसिंग सेंटर के पास भारतीय हिमालयी क्षेत्र और सीमावर्ती इलाकों के ग्लेशियरों का विस्तृत उपग्रह डेटाबेस मौजूद है। इससे ग्लेशियरों और झीलों में होने वाले बदलावों की निगरानी में मदद मिलती है। हालांकि, अचानक होने वाले हिमस्खलन या ग्लेशियर टूटने जैसी घटनाओं की कुछ मिनट पहले सटीक चेतावनी देने में केवल उपग्रह आधारित निगरानी पर्याप्त नहीं है।
विशेषज्ञों के मुताबिक, दुर्गम पर्वतीय इलाकों में सीस्मिक मॉनिटर, जियोफोन और ऑटोमैटिक वाटर लेवल सेंसर जैसे जमीनी उपकरणों की संख्या अभी सीमित है। यही वजह है कि अचानक होने वाली घटनाओं की रियल-टाइम निगरानी और तत्काल अलर्ट जारी करने की क्षमता में अभी सुधार की जरूरत है। एनडीएमए उच्च पर्वतीय क्षेत्रों के लिए स्वदेशी तकनीक पर आधारित अर्ली वार्निंग सिस्टम विकसित और तैनात कर रहा है। हिमाचल प्रदेश में ऑटोमैटिक वेदर स्टेशन और इनसैट आधारित सैटेलाइट संचार प्रणाली का पायलट परीक्षण भी किया जा चुका है।
सीमा पार होने वाली प्राकृतिक आपदाओं की निगरानी एक और बड़ी चुनौती है। तिब्बत या नेपाल जैसे क्षेत्रों में बनने वाली अस्थायी झीलों, भूस्खलन से बने प्राकृतिक बांधों और उनके टूटने से होने वाले जलप्रवाह का आकलन रियल-टाइम डेटा के अभाव में कठिन हो जाता है। सीमा पार सेंसर नेटवर्क से तत्काल जानकारी नहीं मिलने के कारण प्रभावित निचली घाटियों तक चेतावनी पहुंचाने के लिए उपलब्ध समय काफी कम रह जाता है।
भारत मौसम विज्ञान और अंतरिक्ष विज्ञान के क्षेत्र में तेजी से आगे बढ़ रहा है, लेकिन हिमालय जैसे संवेदनशील क्षेत्र में प्रभावी आपदा प्रबंधन के लिए उपग्रह निगरानी के साथ मजबूत जमीनी नेटवर्क और सीमा पार डेटा साझा करने की व्यवस्था भी जरूरी है। इसी दिशा में एआई आधारित एकीकृत अर्ली वार्निंग नेटवर्क विकसित करने पर काम जारी है, जिसका उद्देश्य जोखिम वाले क्षेत्रों की पहचान से लेकर संभावित आपदा की समय रहते चेतावनी देने तक की प्रक्रिया को और प्रभावी बनाना है।