Shimla, 14 July
ऊपरी शिमला क्षेत्र में वन भूमि पर किए गए अतिक्रमण के चलते सेब और अन्य फलदार पेड़ों को हटाने की कार्रवाई तेज़ हो गई है। इस मुद्दे को लेकर राजनीतिक हलकों में बहस छिड़ गई है। सेब उत्पादक संगठनों की आपत्तियों पर प्रतिक्रिया देते हुए हिमाचल प्रदेश के राजस्व एवं बागवानी मंत्री जगत सिंह नेगी ने स्पष्ट किया कि यह कार्रवाई हाईकोर्ट के आदेश पर हो रही है और इसमें राज्य सरकार की कोई मनमानी नहीं है।
नेगी ने कहा कि कोर्ट का फैसला जनवरी में ही आ गया था। राज्य सरकार ने पेड़ों की कटाई पर कुछ समय के लिए राहत की मांग की थी, लेकिन हाईकोर्ट ने वह अर्जी खारिज कर दी। उन्होंने स्पष्ट किया कि एफआरए (वन अधिकार कानून) और अतिक्रमण कानून दो अलग-अलग विषय हैं। एफआरए 2008 से लागू है, लेकिन कई लोग समय पर अपने दावे पेश नहीं कर सके।नेगी ने बताया कि चैथला गांव के 32 लोगों का मामला पहले डीएफओ, फिर एसडीएम, डिविजनल कमिश्नर से होते हुए हाईकोर्ट तक पहुंचा और उसी आधार पर कार्रवाई की जा रही है।
विपक्ष के नेता जयराम ठाकुर द्वारा राहत और पुनर्वास कार्यों में देरी के आरोपों पर मंत्री नेगी ने कड़ा पलटवार किया। उन्होंने कहा कि ऐसे समय में राजनीति करना अनुचित है। नेता प्रतिपक्ष कभी कहते हैं कि सरकार काम कर रही है और कभी कहते हैं कि कुछ नहीं हो रहा।नेगी ने बताया कि सराज क्षेत्र में 50 से अधिक मशीनें राहत कार्यों में लगी हैं, लेकिन लगातार बारिश के चलते आंतरिक सड़कों को खोलने में समय लग रहा है। मुख्यमंत्री, डिप्टी सीएम, लोक निर्माण मंत्री और तकनीकी शिक्षा मंत्री स्वयं आपदा प्रभावित क्षेत्रों का दौरा कर चुके हैं।मुख्यमंत्री की घोषणा का हवाला देते हुए उन्होंने बताया कि जिनके घर पूरी तरह क्षतिग्रस्त हुए हैं, उन्हें 7 लाख रुपये का मुआवजा दिया जाएगा, जबकि केंद्र सरकार केवल 1.5 लाख रुपये की राहत दे रही है। उन्होंने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी पर भी निशाना साधा और कहा कि गुजरात के वडोदरा पुल हादसे में मृतकों को 2-2 लाख रुपये दिए गए थे, लेकिन हिमाचल में 98 मौतें होने के बावजूद कोई विशेष राहत नहीं दी गई।
नेगी ने कहा कि राज्य को भारी नुकसान हुआ है — सड़कें बंद हैं, सेवाएं बाधित हैं, लेकिन सरकार हरसंभव प्रयास कर रही है।