Summer express, नई दिल्ली। भारत में दक्षिण-पश्चिम मानसून की विदाई के साथ ही सर्दियों के मौसम को लेकर चिंताएं बढ़ने लगी हैं। इस बार मानसून के दौरान सामान्य से करीब 13 प्रतिशत कम बारिश दर्ज होने के बाद अब अल नीनो के मजबूत होने की आशंका जताई जा रही है। मौसम वैज्ञानिकों के अनुसार, भूमध्यरेखीय प्रशांत महासागर में विकसित हो रही यह जलवायु स्थिति आने वाले महीनों में और प्रभावी हो सकती है। इसका असर भारत के सर्दियों के तापमान, बारिश और बर्फबारी पर पड़ने की संभावना है।
अल नीनो के मजबूत होने की स्थिति में देश के कई हिस्सों में सर्दियों के दौरान तापमान सामान्य से अधिक रह सकता है। इसके साथ ही बारिश और पहाड़ी क्षेत्रों में बर्फबारी में कमी आने की आशंका भी जताई जा रही है। हालांकि, इसका वास्तविक प्रभाव आने वाले महीनों में मौसम की परिस्थितियों और वैज्ञानिक पूर्वानुमानों पर निर्भर करेगा।
कम बारिश और अपेक्षाकृत गर्म सर्दियों का असर कृषि क्षेत्र पर भी पड़ सकता है। रबी फसलों की बुआई और बेहतर उत्पादन के लिए मिट्टी में पर्याप्त नमी तथा अनुकूल तापमान जरूरी होता है। सर्दियों में अपेक्षित ठंड और बारिश नहीं होने से फसलों की बढ़वार प्रभावित हो सकती है। वहीं, पहाड़ी क्षेत्रों में बर्फबारी कम रहने की स्थिति में गर्मियों के दौरान नदियों और जल स्रोतों में पानी की उपलब्धता पर भी असर पड़ने की आशंका है।
खेती, जल आपूर्ति और बिजली की मांग पर पड़ सकता है असर
मौसम में संभावित बदलाव का प्रभाव केवल तापमान तक सीमित नहीं रहेगा। कृषि, पेयजल आपूर्ति, बिजली की खपत और लोगों की सेहत भी इससे प्रभावित हो सकती है। यदि सर्दियों में तापमान अधिक रहता है और बारिश-बर्फबारी में कमी आती है, तो आने वाले गर्मी के मौसम में जल संकट का दबाव बढ़ सकता है। इसके अलावा, अधिक गर्मी के कारण बिजली की मांग में भी तेजी आने की संभावना रहेगी।
वैज्ञानिकों के अनुमानों के अनुसार, अल नीनो का प्रभाव 2027 की शुरुआती गर्मियों तक बना रहने की स्थिति में कई क्षेत्रों में तापमान बढ़ सकता है। हालांकि, गर्मी की तीव्रता, जल उपलब्धता और बिजली की मांग पर पड़ने वाले वास्तविक प्रभाव का आकलन आगे मिलने वाले मौसम संबंधी आंकड़ों के आधार पर ही किया जा सकेगा।
2015-16 के रिकॉर्ड से आगे जा सकता है अल नीनो
विश्व मौसम विज्ञान संगठन के अनुमानों के मुताबिक, मौजूदा अल नीनो की तीव्रता 2015-16 में दर्ज किए गए मजबूत अल नीनो के स्तर को पार कर सकती है। यदि ऐसा होता है, तो वैश्विक तापमान और दुनिया के विभिन्न हिस्सों में बारिश के पैटर्न पर व्यापक असर पड़ सकता है। भारत में भी सर्दियों के मौसम और आगामी गर्मियों की परिस्थितियों पर नजर रखना महत्वपूर्ण होगा।