30 June, 2025
जब पूरी दुनिया जात-पात, ऊँच-नीच और भेदभाव की दीवारों में बंटी हुई थी, तब एक महान संत ने इंसानियत को एक नई दिशा दी। वो थे गुरु नानक देव जी — सिख धर्म के प्रथम गुरु, जिन्होंने ‘संगत’ और ‘पंगत’ की परंपरा देकर समाज में समानता, एकता और भाईचारे की अलख जगाई।
संगत: एक साथ बैठो, सिखो, जुड़ो
गुरु नानक देव जी ने कहा — “सत्संगत में ही परमात्मा का वास होता है।” संगत का अर्थ है ऐसे लोगों की संगति करना जो भक्ति, सेवा और सच्चाई के मार्ग पर चलें। गुरुद्वारों में संगत का वातावरण आज भी लोगों को जोड़ने का काम करता है — जहाँ जाति, धर्म, रंग, भाषा कोई मायने नहीं रखते।
पंगत: एक थाली, एक समाज
पंगत का मतलब है — एक पंक्ति में बैठकर बिना भेदभाव के भोजन करना। गुरु नानक देव जी ने इस व्यवस्था के माध्यम से सामाजिक समानता का संदेश दिया। आज भी हर गुरुद्वारे में लंगर की परंपरा उसी सोच को आगे बढ़ा रही है। अमीर-गरीब, राजा-रंक — सब एक साथ बैठकर खाते हैं।
आज के दौर में भी प्रासंगिक
आज जब समाज फिर से टुकड़ों में बंटता दिख रहा है, तब गुरु नानक देव जी का संदेश पहले से कहीं ज्यादा जरूरी हो गया है। संगत और पंगत हमें याद दिलाते हैं कि इंसानियत सबसे बड़ा धर्म है। ये न केवल धार्मिक बल्कि सामाजिक सुधार का संदेश है — कि सबको साथ लेकर चलो, सबको बराबरी दो।
गुरु नानक देव जी का जीवन सिर्फ उपदेशों का नहीं, बल्कि एक क्रांति का प्रतीक है। संगत और पंगत उनकी वो सोच है, जो आज भी लाखों दिलों को जोड़ती है।“ना कोई ऊँचा, ना कोई नीचा — सब एक हैं वाहेगुरु की नजर में।”