तीन महादेवियों का इकलौता मंदिर, जहां सामने से नहीं होते दर्शन
September 28, 2025
Mandi, Dharamveerशारदीय नवरात्रों के अवसर पर माता रानी के उस अद्भुत मंदिर की चर्चा करना विशेष हो जाता है, जहां सामने से दर्शन नहीं किए जाते। हिमाचल प्रदेश के मंडी शहर, जिसे छोटी काशी भी कहा जाता है, की पहाड़ियों पर स्थित है माता टारना का प्राचीन मंदिर। यहां देवी महाकाली, महासरस्वती और महालक्ष्मी पिंडी स्वरूप में विराजमान हैं।
16वीं शताब्दी में हुआ निर्माण
ऐतिहासिक मान्यता के अनुसार 16वीं शताब्दी में राजा श्याम सेन ने इस मंदिर का निर्माण करवाया था। कहा जाता है कि उन्हें इस पहाड़ी पर तीन कन्याएं दिखाई दीं। जब राजा वहां पहुँचे तो कोई नहीं मिला। बाद में स्वप्न में माता ने दर्शन दिए और मंदिर बनाने का आदेश दिया। खुदाई के दौरान तीन पिंडी स्वरूपा मूर्तियां प्रकट हुईं, जिन्हें महाकाली, महासरस्वती और महालक्ष्मी माना गया।
क्यों बंद हुआ सामने का दरवाजा
प्रारंभ में मंदिर का मुख्य द्वार पश्चिम दिशा में था। लेकिन सामने से माता के दर्शन करने के बाद श्रद्धालु मूर्छित हो जाते थे। पुजारी हर्ष शर्मा के अनुसार, माता ने स्वयं राजा श्याम सेन को स्वप्न में दर्शन देकर द्वार को साइड से बनाने की बात कही। इसके बाद उत्तर दिशा में नया द्वार बनाया गया और पश्चिम का द्वार सदा के लिए बंद कर दिया गया। आज तक श्रद्धालु उत्तर दिशा से ही माता के दर्शन करते हैं।
अद्भुत आस्था का केंद्र
मंदिर में सिंह की प्रतिमा पिंडियों के ठीक सामने पश्चिम दिशा की ओर स्थित है, वहीं दरवाजा अब भी बंद है। स्थानीय लोग माता को टारना या श्याम काली के नाम से पुकारते हैं। श्रद्धालु महेंद्र पाल और जोगिंद्र शर्मा का कहना है कि माता सभी को तारने का काम करती हैं, इसी कारण इस मंदिर का नाम टारना माता पड़ा।
शिवरात्रि पर उमड़ती है भीड़
हर वर्ष शिवरात्रि महोत्सव के दौरान यहां अपार भीड़ उमड़ती है। जनपद मंडी के अराध्य देव कमरूनाग भी इसी मंदिर में विराजते हैं। इस दौरान श्रद्धालुओं को लंबी कतारों में अपनी बारी का इंतजार करना पड़ता है।
वीवीआईपी भी झुकाते हैं शीश
हिमाचल प्रदेश का कोई राज्यपाल, मुख्यमंत्री, मंत्री या नेता ऐसा नहीं, जिसने इस दरबार में आकर नतमस्तक न हुआ हो। अंतरराष्ट्रीय शिवरात्रि महोत्सव में आने वाले सभी वीवीआईपी यहां माता टारना के दर्शन करना नहीं भूलते।मंडी की धार्मिक पहचान में टारना माता मंदिर अपनी अनूठी परंपरा और विशेषता के कारण आज भी सर्वोपरि माना जाता है।
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