30 September, 2025
आज हम आपको माता रानी के एक ऐसे मंदिर के बारे में बताने जा रहे हैं जिसका रूप और स्वरूप तो वही है लेकिन राजा के साथ हुए एक चमत्कार के बाद माता रानी के इस दरबार का नाम ही बदल दिया गया है। नवरात्रों पर जानिए हिमाचल के मंडी जिला के इस प्रसिद्ध शक्तिपीठ के बारे में कि आखिर क्यों और कैसे बदला गया माता रानी के दरबार का नाम।
रिवालसर की पहाड़ियों पर विराजमान माता नैणा देवी को पहले जाना जाता था उग्रतारा के नाम से
रूप वही, स्वरूप भी वही। मूर्ति भी वही और मंदिर भी वही। लेकिन पहले जिस मूर्ति को उग्रतारा के रूप में पूजा जाता था अब उसी मूर्ति को नैणा देवी के रूप में पूजा जाता है। आखिर ऐसा क्या हुआ कि माता रानी के दरबार का नाम ही बदल दिया गया। यह कहानी है मंडी जिला के प्रसिद्ध शक्तिपीठ श्री नैणा देवी मंदिर की। मंडी जिला में रिवालसर की पहाड़ियों पर विराजमान माता नैणा देवी का मंदिर सदियों पुराना है। लोमश ऋषि की तपस्या के बाद माता पार्वती इस स्थान पर उग्रतारा के रूप में विराजमान हुई। मंडी के इतिहास के अनुसार 1894 में तत्कालीन राजा वियज सेन की आंखों की रोशनी चली जाती है। राजा ने हर जगह उपचार करवाया लेकिन वह ठीक नहीं हो सके। एक रात माता उग्रतारा उनके स्वप्न में आई और मंदिर में आंखों की प्रतिमाएं अर्पित करने को कहा। राजा विजय सेन ने मंदिर में यह प्रतिमाएं अर्पित की और उसके बाद उनकी आंखों की रोशनी वापिस लौट आई। मंदिर के पुजारी मोरध्वज ने बताया कि राजा ने तभी से माता का नाम नैणा माता रखा और तभी से माता उग्रतारा को नैणा देवी के रूप में जाना और पूजा जाता है.
1905 के भूकंप में नष्ट हो गया था मंदिर
16वीं सदी में मंडी के राजा सूरज सेन ने यहां माता का भव्य मंदिर बनवाया जोकि 1905 के भूकंप में धराशाही हो गया। उसके बाद यहां फिर से मंदिर का निर्माण किया गया। आज मंदिर का संचालन श्री नैणा देवी बाबा धजाधारी मंदिर कमेटी रिवालसर द्वारा किया जाता है। मंदिर कमेटी के प्रधान धर्मपाल शर्मा ने बताया कि रोजाना लगभग एक हजार लोग माता रानी के दरबार में हाजरी भरते हैं जबकि नवरात्रों में यह संख्या 4 से 5 हजार तक पहुंच जाती है। रोजाना मंदिर में लंगर व्यवस्था सुचारू रहती है और यहां हर भक्त के रहने-खाने की उचित व्यवस्था मंदिर कमेटी द्वारा की गई है।
मन्नतें पूरी होने पर चढ़ाई जाती हैं सोने-चांदी की प्रतिमाएं
सरकाघाट निवासी शिल्पा चोपड़ा ने बताया कि उन्हें आंखों की समस्या थी जिसका असर आगे उनकी संतानों पर भी पड़ सकता था। उन्होंने माता के दरबार में आकर मन्नत मांगी। आज उनकी आंखों की समस्या भी ठीक है और बच्चों को भी कोई दिक्कत नहीं है। उन्होंने मन्नत पूरी होने पर माता के दरबार में सोने की आंखों की प्रतिमाएं अर्पित की थी। एक अन्य श्रद्धालु परवीन गुप्ता ने बताया कि माता की महिमा अपरमपार है। यहां से कोई भक्त कभी खाली हाथ नहीं लौटता।
सभी मनोकामनाओं को पूरा करती है मां
माता रानी सिर्फ आंखों से संबंधित परेशानियों को ही दूर नहीं करती, बल्कि यहां से कोई भक्त खाली हाथ नहीं लौटता। यही कारण है कि माता के इस दरबार में वर्ष भर श्रद्धालुओं का खूब जमावड़ा लगा रहता है।