Kullu, Manminder Arora
विश्व प्रसिद्ध अंतरराष्ट्रीय कुल्लू दशहरा उत्सव में इस वर्ष भी देव संस्कृति की झलक देखने को मिल रही है। भगवान नरसिंह की पारंपरिक शाही जलेब (शोभायात्रा) शाही ठाठ और भव्यता के साथ निकाली जा रही है। यह जलेब, जिसे स्थानीय लोग ‘राजा की जलेब’ के नाम से भी जानते हैं, कुल्लू रियासत की शाही परंपरा और देव संस्कृति की प्राचीन विरासत का प्रतीक मानी जाती है।
देव रथों के संग नाचते है देवलू
दशहरा के दूसरे दिन से लेकर सातवें दिन तक प्रतिदिन यह शोभायात्रा निकाली जाती है, जिसमें हर दिन अलग-अलग घाटियों के देव रथ शामिल होते हैं।स्थानीय मान्यता के अनुसार, भगवान नरसिंह की यह जलेब उत्सव स्थल के चारों ओर देव सुरक्षा चक्र तैयार करती है, जिससे नकारात्मक शक्तियां, आपदाएं और बीमारियां उत्सव क्षेत्र के पास नहीं आतीं। यह परंपरा कुल्लू की दिव्य विरासत और देव संस्कृति की सुरक्षा परंपरा का प्रतीक मानी जाती है।
शोभायात्रा की शुरुआत ढालपुर मैदान में अस्थायी रूप से स्थापित राजा की चणनी से होती है। कुल्लू राजवंश के उत्तराधिकारी महेश्वर सिंह, जो भगवान नरसिंह के प्रतिनिधि माने जाते हैं, विशेष पालकी में सवार होकर यात्रा का नेतृत्व करते हैं।जलेब में सबसे आगे भगवान नरसिंह की सुसज्जित घोड़ी चलती है, उसके दोनों ओर देव रथ, और उनके पीछे सैकड़ों देवलू (देव सेवक) ढोल-नगाड़ों, रणभेरियों और करनालों की गूंज के बीच नृत्य करते हुए चलते हैं।
प्रतिदिन नरसिंह भगवान ढालपुर मैदान में बांधते है रक्षा सूत्र
भगवान रघुनाथ के कारदार दानवेन्द्र सिंह के अनुसार, यह शोभायात्रा भगवान नरसिंह की है, जिन्हें कुल्लू राजगद्दी का संरक्षक देवता माना जाता है। यह केवल धार्मिक आयोजन नहीं, बल्कि सुरक्षा का प्रतीक चक्र भी है। इसमें गद्दी के प्रतीक — ढाल, तलवार और अन्य शाही चिन्ह साथ चलते हैं।हर दिन यह यात्रा देवी हिडिम्बा मंदिर के स्थान पर जाकर समाप्त होती है। भले ही समय के साथ कई परंपराओं में परिवर्तन आया हो, लेकिन कुल्लू के देवताओं ने स्वयं निर्णय लेकर इस सदियों पुरानी शाही जलेब परंपरा को अक्षुण्ण बनाए रखने का आदेश दिया है।