नई दिल्ली। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) के सरसंघचालक मोहन भागवत ने देश में विभाजनकारी सोच और उग्र भाषा पर सख्त रुख अपनाते हुए कहा कि “तेरे टुकड़े होंगे” जैसी बातें भारत की आत्मा के खिलाफ हैं। यह भारत के लिए जीने और उसे आगे बढ़ाने का समय है, न कि नकारात्मकता और टकराव फैलाने का।
अंडमान में स्वतंत्रता सेनानी विनायक दामोदर सावरकर के प्रसिद्ध गीत ‘सागर प्राण तलमाला’ की 115वीं वर्षगांठ पर आयोजित कार्यक्रम में भागवत ने कहा कि सावरकर की देशभक्ति हमें राष्ट्र को सर्वोपरि रखने की सीख देती है। उन्होंने कहा कि अपने देश के प्रति निष्ठा ही सबसे बड़ा धर्म है और समाज में ऐसी भाषा या सोच की कोई जगह नहीं होनी चाहिए जो देश को बांटने का काम करे।
संघ प्रमुख ने कहा कि आज समाज में छोटी-छोटी बातों पर वैचारिक टकराव देखने को मिलता है, लेकिन एक मजबूत और महान राष्ट्र के निर्माण के लिए हमें सावरकर के विचारों को आत्मसात करना होगा। उन्होंने स्पष्ट किया कि सावरकर ने कभी जाति, क्षेत्र या संकीर्ण पहचान को महत्व नहीं दिया, बल्कि हमेशा राष्ट्र को एक इकाई के रूप में देखा।
जाति और धर्म के नाम पर बढ़ते विभाजन पर चिंता जताते हुए मोहन भागवत ने कहा कि राष्ट्र निर्माण के लिए साधु बनना जरूरी नहीं है। व्यक्ति अपने पेशे में आगे बढ़े, धन कमाए, लेकिन देश को कभी न भूले। हर कार्य में राष्ट्रहित को प्राथमिकता देना जरूरी है।
उन्होंने कहा कि हमें अपने व्यक्तिगत स्वार्थों को पीछे रखकर देश के लिए काम करना होगा। सावरकर ने बिना किसी निजी लाभ के भारत के लिए संघर्ष किया और उसी भावना को अपनाकर ही उनके सपनों का भारत बनाया जा सकता है।
कार्यक्रम के दौरान अंडमान के बेओदनाबाद में सावरकर की प्रतिमा का अनावरण भी किया गया। इस अवसर पर केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह सहित कई गणमान्य व्यक्ति मौजूद रहे।