Nurpur, Sanjeev Mahajan-:नूरपुर क्षेत्र के अंतर्गत आयुष विभाग हिमाचल प्रदेश द्वारा संचालित राजकीय आयुर्वेदिक चिकित्सालय सुलयाली में प्राचीन आयुर्वेदिक चिकित्सा पद्धति जलौका रक्तमोक्षण के माध्यम से विभिन्न रोगों का सफल उपचार किया जा रहा है। लगभग 2500 वर्ष पुरानी यह पद्धति पंचकर्म चिकित्सा का एक महत्वपूर्ण अंग मानी जाती है, जिसका मुख्य उद्देश्य शरीर से दूषित एवं विषाक्त रक्त को बाहर निकालकर स्वास्थ्य में सुधार लाना है।
इस उपचार प्रक्रिया में औषधीय जोंकों (जलौका) का प्रयोग किया जाता है, जो प्रभावित स्थान से अशुद्ध रक्त को धीरे-धीरे बाहर निकालती हैं। यह चिकित्सा विशेष रूप से त्वचा रोग, एलर्जी, जोड़ों के दर्द, सूजन और रक्तदोष जैसी समस्याओं में प्रभावी साबित हो रही है। अस्पताल में आने वाले रोगियों में इस पद्धति के प्रति विश्वास लगातार बढ़ रहा है।
चिकित्सा प्रभारी डॉ. सन्नी जरियाल ने जानकारी देते हुए बताया कि जोंक की लार में पाए जाने वाले हिरुडिन (Hirudin) जैसे जैविक तत्वों में थक्का-रोधी और सूजन-रोधी गुण होते हैं। इससे प्रभावित अंग में रक्त संचार बेहतर होता है, ऑक्सीजन की आपूर्ति बढ़ती है और शरीर की प्राकृतिक रोग-प्रतिरोधक व स्व-उपचार क्षमता सक्रिय हो जाती है। उन्होंने बताया कि कई मामलों में बिना अधिक दवाइयों के ही रोगियों को उल्लेखनीय लाभ मिला है।
डॉ. जरियाल के अनुसार, पिछले चार महीनों से अस्पताल में जलौका रक्तमोक्षण उपचार नियमित रूप से किया जा रहा है। रोगियों को सप्ताह में एक बार यह उपचार दिया जाता है और सामान्यतः 5 से 6 सत्रों में सकारात्मक परिणाम देखने को मिलते हैं। केवल पिछले एक महीने में लगभग 25 रोगियों ने इस पद्धति से उपचार कराया है, जबकि अब तक करीब 70 रोगी इससे लाभान्वित हो चुके हैं।उपचार कराने आईं हौरी देवी ने बताया कि वर्षों से चली आ रही हाथ-पैरों की एलर्जी से उन्हें काफी राहत मिली है। वहीं उनके पति राजेश कुमार ने कहा कि सरकारी आयुर्वेदिक अस्पताल में कम खर्च में प्रभावी इलाज मिलना आम लोगों के लिए बड़ी सुविधा है। जलौका रक्तमोक्षण से मिल रहे सकारात्मक परिणामों के कारण क्षेत्र में आयुर्वेदिक चिकित्सा के प्रति लोगों का भरोसा तेजी से बढ़ रहा है।