Summer express,मुंबई | सप्ताह के पहले कारोबारी दिन सोमवार (9 मार्च) को भारतीय शेयर बाजार में तेज गिरावट देखने को मिली। बाजार खुलते ही बिकवाली का दबाव बढ़ गया, जिसके चलते निवेशकों को भारी नुकसान उठाना पड़ा। बॉम्बे स्टॉक एक्सचेंज (BSE) में सूचीबद्ध कंपनियों का कुल बाजार पूंजीकरण घटकर करीब 437 लाख करोड़ रुपये रह गया और निवेशकों की संपत्ति में लगभग 14 लाख करोड़ रुपये की कमी दर्ज की गई।
कारोबार की शुरुआत में सेंसेक्स करीब 2,400 अंक टूटकर लगभग 76,424 के स्तर तक पहुंच गया, जबकि निफ्टी 50 करीब 700 अंक गिरकर 23,750 के आसपास आ गया। बाजार में लगभग सभी सेक्टर दबाव में रहे और कई प्रमुख कंपनियों के शेयरों में तेज गिरावट दर्ज की गई।
एविएशन कंपनी इंडिगो के शेयर करीब 8 प्रतिशत तक फिसल गए। वहीं टाटा स्टील, एलएंडटी, एसबीआई और मारुति सुजुकी जैसे दिग्गज शेयरों में करीब 5 प्रतिशत तक की गिरावट देखने को मिली। सरकारी बैंकों के शेयरों पर भी दबाव रहा और PSU बैंक इंडेक्स में 5 प्रतिशत से अधिक की गिरावट दर्ज की गई।
विशेषज्ञों के अनुसार बाजार में आई इस बड़ी गिरावट के पीछे कई वैश्विक और घरेलू कारण जिम्मेदार हैं। अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमतों में तेज उछाल ने निवेशकों की चिंता बढ़ा दी है। अमेरिका और ईरान के बीच बढ़ते तनाव के कारण तेल सप्लाई प्रभावित होने की आशंका जताई जा रही है, जिससे ब्रेंट और WTI कच्चे तेल की कीमतें 118 डॉलर प्रति बैरल के पार पहुंच गई हैं।
इसके अलावा पश्चिम एशिया में जारी संघर्ष और अमेरिका, इजरायल तथा ईरान के बीच बढ़ते तनाव ने वैश्विक बाजारों में अनिश्चितता पैदा कर दी है। इस स्थिति में निवेशक जोखिम वाले निवेश से दूरी बना रहे हैं, जिसका असर शेयर बाजार पर साफ दिखाई दे रहा है।
कच्चे तेल की कीमतों में तेजी का असर भारतीय मुद्रा पर भी पड़ा है। डॉलर के मुकाबले रुपया कमजोर होकर करीब 92.19 के स्तर तक पहुंच गया, जिससे आयात महंगा होने की आशंका बढ़ गई है। वहीं अमेरिका में 10 साल के सरकारी बॉन्ड की यील्ड करीब 4.2 प्रतिशत तक पहुंचने से निवेशकों का रुझान सुरक्षित निवेश विकल्पों की ओर बढ़ रहा है।
इसके साथ ही विदेशी संस्थागत निवेशक (FII) भी भारतीय बाजार से लगातार पैसा निकाल रहे हैं। मार्च के शुरुआती दिनों में ही हजारों करोड़ रुपये की बिकवाली दर्ज की गई है, जिससे बाजार पर अतिरिक्त दबाव बना हुआ है।
विशेषज्ञों का मानना है कि कच्चे तेल की कीमतों में लगातार बढ़ोतरी से महंगाई बढ़ने की आशंका भी गहरा सकती है। यदि तेल की कीमतें लंबे समय तक ऊंचे स्तर पर बनी रहती हैं तो परिवहन और उत्पादन लागत बढ़ सकती है, जिसका असर अर्थव्यवस्था और बाजार दोनों पर पड़ सकता है।