Summer express, नई दिल्ली | जलवायु परिवर्तन के कारण भारत में मानसून के दौरान उमस भरी गर्मी का खतरा लगातार बढ़ रहा है। एक नए अध्ययन में चेतावनी दी गई है कि वैश्विक तापमान में 2 डिग्री सेल्सियस की वृद्धि होने पर मानसून के मौसम में “असहनीय हीट स्ट्रेस” खतरनाक स्तर तक पहुंच सकता है, जिससे देश के करीब 1.2 अरब लोग प्रभावित हो सकते हैं।
अमेरिकन जियोफिजिकल यूनियन (AGU) की पत्रिका एडवांसेज में प्रकाशित अध्ययन के अनुसार, मानसून के दौरान बारिश के बीच आने वाले शुष्क दिनों में बढ़ती गर्मी और नमी का संयोजन लोगों के स्वास्थ्य के लिए गंभीर खतरा बन रहा है। शोधकर्ताओं ने बताया कि जलवायु के गर्म होने के साथ जुलाई से अक्टूबर के बीच असहनीय हीट स्ट्रेस की घटनाओं में तेजी से वृद्धि देखी जा रही है।
आईआईटी गांधीनगर, स्टैनफोर्ड विश्वविद्यालय और पर्ड्यू विश्वविद्यालय के वैज्ञानिकों ने अध्ययन में पाया कि वर्ष 1979 से 2021 के बीच असहनीय हीट स्ट्रेस की घटनाएं अधिक बार होने लगी हैं और इसका दायरा भी बढ़ा है। 1980 के दशक में जहां इसका प्रभाव करीब 0.1 लाख वर्ग किलोमीटर क्षेत्र तक सीमित था, वहीं 2020 तक यह बढ़कर 0.4 लाख वर्ग किलोमीटर तक पहुंच गया।
शोधकर्ताओं के अनुसार, अत्यधिक तापमान और आर्द्रता के कारण शरीर की प्राकृतिक शीतलन प्रक्रिया प्रभावित होती है, जिससे हीट स्ट्रोक, गंभीर बीमारियों, अंगों के फेल होने और मृत्यु तक का खतरा बढ़ जाता है। लंबे समय तक रहने वाला हीट स्ट्रेस सार्वजनिक स्वास्थ्य, श्रम उत्पादकता और जलवायु अनुकूलन क्षमता के लिए बड़ी चुनौती बन सकता है।
अध्ययन में गंगा के मैदानी क्षेत्रों और तटीय इलाकों को सबसे अधिक संवेदनशील बताया गया है। वैज्ञानिकों का कहना है कि बंगाल की खाड़ी से आने वाली नमी युक्त हवाएं और बढ़ता तापमान इन क्षेत्रों में जोखिम को और बढ़ा रहे हैं। वहीं, पंजाब समेत उत्तर-पश्चिम भारत के कुछ हिस्सों में भी मानसून के दौरान गंभीर हीट स्ट्रेस की स्थिति दर्ज की गई है।
शोध में चेतावनी दी गई है कि यदि वैश्विक तापमान में 2 डिग्री सेल्सियस की वृद्धि होती है, तो मानसून के दौरान देश का 53 प्रतिशत क्षेत्र असहनीय हीट स्ट्रेस की चपेट में आ सकता है। विशेषज्ञों का मानना है कि जलवायु परिवर्तन पर प्रभावी नियंत्रण नहीं होने की स्थिति में मानसून का मौसम भी आने वाले वर्षों में लोगों के लिए गंभीर स्वास्थ्य संकट का कारण बन सकता है।