Dharamshala, Rahul-:हिमाचल प्रदेश की सुरम्य पहाड़ियों में खेती हमेशा से जीवन का आधार रही है, लेकिन छोटे खेत, बिखरी जोतें और बदलते मौसम ने किसानों को सीमित दायरे में बांध रखा था। अब सरकार की महत्वाकांक्षी हिम कृषि योजना इन चुनौतियों को अवसरों में बदल रही है। आधुनिक तकनीक, उच्च सब्सिडी और क्लस्टर आधारित खेती के मॉडल ने गांव-गांव में नई उम्मीद जगाई है।
योजना के अंतर्गत किसानों को 30 से 80 प्रतिशत तक सब्सिडी देकर अत्याधुनिक कृषि उपकरण, पॉलीहाउस, ड्रिप और स्प्रिंकलर जैसी तकनीकें उपलब्ध करवाई जा रही हैं। पहाड़ी क्षेत्रों में जहां पानी हमेशा चिंता का विषय रहा है, वहीं इन तकनीकों ने कम पानी में भी अधिक उत्पादन संभव किया है। इससे न सिर्फ उत्पादन बढ़ा है बल्कि खर्च भी कम हुआ है और किसानों की आय में उल्लेखनीय वृद्धि दर्ज की गई है।
कांगड़ा के उपायुक्त हेमराज बैरवा ने बताया कि जिले में 80 कनाल के क्लस्टर बनाकर किसानों को समूह में प्रशिक्षण, तकनीकी सहायता और मार्केट लिंक उपलब्ध करवाई जा रही है। उन्होंने बताया कि हल्दी जैसी उच्च मूल्य वाली फसलों की ओर किसानों का रुझान बढ़ा है। पहले जहां पारंपरिक फसलों से एक किसान को प्रति कनाल 4–5 हजार रुपये की आय होती थी, वहीं अब यह बढ़कर 45 हजार रुपये प्रति कनाल तक पहुंच रही है।
कृषि उप निदेशक कांगड़ा कुलदीप धीमान ने बताया कि जिले में अब तक 37 क्लस्टर स्थापित किए जा चुके हैं, जिनका कुल क्षेत्रफल करीब 1770 बीघा है। इनसे 1451 परिवार सीधे लाभान्वित हो रहे हैं। उन्होंने कहा कि योजना के साथ-साथ किसानों को प्राकृतिक खेती अपनाने के लिए भी प्रेरित किया जा रहा है, जिससे उत्पादन लागत और कम हो रही है।
धर्मशाला के डिक्टू-झियोल गांव की महिला किसान अनिता कुमारी इस बदलाव की मिसाल हैं। उन्होंने शुरुआत में 8 पॉलीहाउस लगाए और अब 8 और पॉलीहाउस जोड़ रही हैं। अनिता ताइवान किस्म का खीरा उगाती हैं, जिससे उन्हें 8 पॉलीहाउस से लगभग 10–12 टन उत्पादन मिलता है। दो सीज़न में उनकी आमदनी ढाई से तीन लाख रुपये तक पहुंच जाती है। अनिता कहती हैं— “हिम कृषि योजना ने सच मायनों में हमारी जिंदगी बदल दी है।”अनिता की तरह निशा देवी और मनोहर सिंह जैसे अनेक किसान बताते हैं कि क्लस्टर गांव आने से घर के पास ही रोजगार मिल गया और पारिवारिक आय पहले की तुलना में कई गुना बढ़ी है।हिम कृषि योजना पारंपरिक खेती को आधुनिक तकनीक से जोड़कर हिमाचल के किसानों के आत्मविश्वास को नई उड़ान दे रही है। यह सिर्फ एक सरकारी कार्यक्रम नहीं, बल्कि पहाड़ की खेती को समृद्धि, रोजगार और स्थायी विकास का रास्ता दिखाने वाला अभियान बन चुका है।