रूस | रूस-यूक्रेन युद्ध के बीच भारत द्वारा रियायती दरों पर रूसी तेल खरीदने की नीति ने अंतरराष्ट्रीय स्तर पर नई बहस छेड़ दी है। अमेरिका और नाटो देशों में यह चिंता गहराती जा रही है कि भारत, जो लोकतांत्रिक मूल्यों का बड़ा पक्षधर और उनका रणनीतिक साझेदार है, आखिर रूस के खिलाफ पश्चिमी मोर्चे पर क्यों नहीं खड़ा हो रहा।
रूसी तेल बना कूटनीतिक दरार की वजह
यूक्रेन युद्ध के बाद रूस पर सख्त आर्थिक प्रतिबंध लगाए गए थे। उद्देश्य था, रूस को वैश्विक आर्थिक व्यवस्था से अलग-थलग करना। लेकिन भारत ने व्यावहारिक रुख अपनाते हुए अपनी ऊर्जा ज़रूरतों के लिए रूस से सस्ता तेल खरीदना जारी रखा। इससे भारत को लाभ तो मिला, लेकिन पश्चिमी देशों को अपनी रणनीति कमजोर पड़ती नजर आई।
भारत का स्पष्ट जवाब: “राष्ट्रीय हित पहले”
भारत का कहना है कि उसकी विदेश नीति स्वतंत्र और संतुलित है। रूस उसका पुराना सामरिक साझेदार है, जिससे 60% रक्षा उपकरण मिलते हैं। तेल की खरीद एक आर्थिक फैसला है, किसी युद्ध का समर्थन नहीं। भारत ने बार-बार शांति, बातचीत और अंतरराष्ट्रीय कानून के सम्मान की वकालत की है।
भारत पर संभावित दबाव की अटकलें
यूरोपीय हलकों में यह चर्चा तेज है कि भारत पर आर्थिक प्रतिबंध या टैक्स जैसे दंडात्मक कदम उठाए जा सकते हैं। कुछ अमेरिकी नेताओं ने भारत पर 500% टैक्स तक लगाने की मांग की है। नाटो प्रमुख ने भी भारत को खुली चेतावनी दी है कि रूस से तेल लेना महंगा पड़ सकता है।
भारत को झुकाना अब आसान नहीं
मोदी सरकार के नेतृत्व में भारत अब वैश्विक राजनीति में निर्णायक भूमिका निभा रहा है। चाहे क्वाड का हिस्सा बनना हो या G20 की अध्यक्षता, भारत ने यह साबित किया है कि वह दबाव में नहीं आता। रूस से S-400 डील हो या अनुच्छेद 370 पर फैसला—भारत ने हमेशा आत्मनिर्भर और निर्भीक विदेश नीति को प्राथमिकता दी है।
भारत की नीति: रणनीतिक संतुलन की मिसाल
भारत किसी सैन्य गठबंधन का हिस्सा नहीं है। उसकी विदेश नीति का आधार है – ‘संपर्क सभी से, पर निर्भरता किसी पर नहीं।’ एक तरफ वह अमेरिका और जापान जैसे देशों के साथ हिंद-प्रशांत क्षेत्र में सहयोग कर रहा है, तो दूसरी ओर रूस से पुराने रिश्ते भी कायम रखे हैं।