लुधियाना | हल्का वेस्ट के उपचुनाव में कांग्रेस की करारी हार ने पार्टी की आंतरिक खींचतान को एक बार फिर उजागर कर दिया है। सियासी हलकों में चर्चा जोरों पर है कि यह हार पार्टी के अंदर छिपे टकराव और असहमति का परिणाम है, जो लोकसभा चुनावों से ही शुरू हो गई थी।
सूत्रों के मुताबिक, लोकसभा चुनाव के दौरान प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष राजा वडिंग द्वारा भारत भूषण आशु की टिकट रद्द कराए जाने से दोनों नेताओं के बीच तनाव गहरा गया। बदले में आशु ने भी उपचुनाव के प्रचार में वडिंग को दरकिनार कर दिया। शुरुआत होर्डिंग्स में वडिंग की तस्वीर न लगाने से हुई, जिसके बाद लुधियाना पहुंचे वडिंग को स्थानीय कांग्रेस नेताओं सुरेंद्र डाबर, राकेश पांडे, संजय तलवाड़, बैंस ब्रदर्स, कुलदीप वैद और जस्सी खंगुड़ा के साथ मिलकर आशु ने बिना भेंट किए लौटा दिया।
राजा वडिंग ने भी जताया विरोध
हाईकमान के निर्देश पर भले ही वडिंग आशु के नामांकन में शामिल हुए और पार्टी प्रभारी भूपेश बघेल के साथ प्रेस कॉन्फ्रेंस में भी बैठे, लेकिन दोनों नेताओं की आपसी दूरी साफ नजर आई। प्रचार के दौरान भी वडिंग रोड शो से दूरी बनाए रहे, जबकि कई स्थानीय नेता भी प्रचार से नदारद रहे। कांग्रेस के अंदरूनी सूत्रों का कहना है कि आशु को चरणजीत चन्नी, राणा गुरजीत, प्रगट सिंह, राजकुमार वेरका और किक्की ढिल्लों जैसे वडिंग विरोधी नेताओं का समर्थन प्राप्त था।
विवाद बढ़ा सोशल मीडिया पोस्ट से
चुनाव नतीजों के बाद राजा वडिंग की फेसबुक पर डाली गई एक विक्ट्री साइन वाली पोस्ट ने हलचल मचा दी, जिसे बाद में डिलीट कर दिया गया। इस पर प्रतिक्रिया देते हुए आशु ने कहा कि यदि ऐसी कोई पोस्ट की गई थी, तो यह छोटी सोच का परिणाम है।
बैंस ने भी जताई नाराजगी, राहुल गांधी से ‘घोड़े बदलने’ की अपील
पूर्व विधायक सिमरजीत बैंस ने भी आशु पर निशाना साधते हुए कहा कि वह उन्हें पार्टी में शामिल नहीं करना चाहते थे। उन्होंने आरोप लगाया कि उपचुनाव के दौरान जब वे आशु के घर समर्थन देने गए, तो उन्हें कोई तवज्जो नहीं दी गई। बैंस ने कहा, “इज्जत तो दूर की बात है, हमारे साथ ऐसा व्यवहार हुआ जैसे छूत की बीमारी हो।”
उन्होंने कहा कि अगर सब लोग मिलकर काम करते, तो आशु की जीत तय थी। बैंस ने राहुल गांधी से आग्रह किया कि वे लुधियाना वेस्ट के परिप्रेक्ष्य में “लंगड़े और बाराती घोड़े बदलने” की नीति को अमल में लाएं।