3 July, 2025
सिख धर्म के चौथे गुरु श्री गुरु रामदास जी की वाणी आज भी समाज को आध्यात्म, सेवा और प्रेम का संदेश देती है। उनका जीवन और उपदेश मानवता के लिए प्रेरणा का स्रोत हैं।
गुरु रामदास जी ने सेवा (निस्वार्थ सेवा), भक्ति और विनम्रता को जीवन का आधार बताया। उन्होंने कहा था:“सेवा करतो होए नीसाल, हरि सिमरत अनद अनूप।”अर्थात सेवा करते हुए परमात्मा का स्मरण करें, यही सच्चा आनंद है।उन्होंने अमृतसर शहर की स्थापना की और हरमंदिर साहिब (स्वर्ण मंदिर) के निर्माण की नींव रखी, जो आज पूरे विश्व में आध्यात्मिक शांति और सांझी सांस्कृतिक विरासत का प्रतीक है।
गुरु रामदास जी की वाणी में छिपा जीवन का मार्ग
उनकी बाणी में जीवन को सरल, शांत और सच्चे मार्ग पर चलने की प्रेरणा मिलती है। उन्होंने प्रेम, विनम्रता और सच्चे विश्वास को सर्वोच्च माना।
“हरि का नामु राखु उर धारि, मन नीरु करो गुर सबद बीचारि।”अर्थ: मन को निर्मल बनाकर गुरबाणी के विचारों से जीवन को संवारो।
आज भी प्रासंगिक हैं उनके विचार
आज के समय में, जब समाज भागदौड़ और तनाव से जूझ रहा है, गुरु रामदास जी की वाणी हमें आत्मिक शांति, मानव सेवा और सहअस्तित्व का मार्ग दिखाती है।उनकी शिक्षाएं सिर्फ धार्मिक सीमाओं तक सीमित नहीं, बल्कि सम्पूर्ण मानवता को जोड़ने वाला एक पुल हैं।