रूस | रूस और यूक्रेन के बीच चल रहे युद्ध को लेकर दुनियाभर में आलोचना हो रही है, लेकिन रूस समर्थक विश्लेषक लगातार एक ही तर्क दोहराते हैं—शीत युद्ध के अंत में पश्चिमी देशों ने रूस से यह वादा किया था कि ‘नाटो एक इंच भी पूर्व की ओर नहीं बढ़ेगा’, लेकिन इस वादे को तोड़ दिया गया।
क्या वास्तव में अमेरिका और नाटो ने ऐसा कोई वादा किया था?
यह कथन सबसे पहले वर्ष 1990 में सामने आया, जब अमेरिका के तत्कालीन विदेश मंत्री जेम्स बेकर ने सोवियत नेता मिखाइल गोर्बाचेव से जर्मनी के एकीकरण को लेकर बातचीत की थी। उस दौरान बेकर ने कहा था कि यदि रूस जर्मनी के एकीकरण को स्वीकार कर ले, तो नाटो पूर्व की ओर “एक इंच भी नहीं बढ़ेगा”। रूस समर्थकों का दावा है कि यह बयान एक औपचारिक वादा था।
लेकिन अमेरिका और यूरोपीय विशेषज्ञ क्या कहते हैं?
इतिहासकारों और राजनयिकों का कहना है कि यह कथन किसी लिखित समझौते का हिस्सा नहीं था, बल्कि सिर्फ एक बातचीत का अंश था जो केवल जर्मनी तक सीमित था। नाटो की नीति यह रही है कि हर संप्रभु देश को यह अधिकार है कि वह अपनी सुरक्षा के लिए किस संगठन में शामिल होना चाहता है।
रूस क्यों दे रहा है इस तर्क को हवा?
रूस के राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन और उनके समर्थक यह कहकर पश्चिम पर हमला बोलते हैं कि नाटो का विस्तार रूस की सुरक्षा के लिए खतरा बन गया है और इसी कारण उन्होंने यूक्रेन पर हमला किया। लेकिन विशेषज्ञ मानते हैं कि यह तर्क न तो सैन्य हमले को सही ठहरा सकता है, न ही यह अंतरराष्ट्रीय कानून के अनुरूप है।
पूर्वी यूरोप ने खुद क्यों चुना नाटो?
पोलैंड, हंगरी, रोमानिया और बाल्टिक देशों जैसे कई पूर्वी यूरोपीय राष्ट्र स्वयं रूसी प्रभाव से बचने के लिए नाटो में शामिल हुए। यह उनके संप्रभु निर्णय थे, न कि किसी दबाव में लिए गए फ़ैसले।