Kullu, Manminder Arora
जिला मुख्यालय ढालपुर मैदान में हाल ही में संपन्न अंतरराष्ट्रीय दशहरा उत्सव में नाबार्ड ने किसान उत्पादक संगठनों के स्टॉल लगाए, जिनमें लाहौल-स्पीति जिले का स्टॉल भी शामिल था। यहाँ की पारंपरिक जुराब और दस्ताने लोगों में खासा लोकप्रिय रहे।
जीआई टैग मिलने के बाद लाहौल-स्पीति की जुराब और दस्तानों की मांग न सिर्फ देश के अन्य राज्यों में, बल्कि विदेशों में भी बढ़ रही है। इससे स्थानीय महिलाओं को रोजगार के नए अवसर मिल रहे हैं।नाबार्ड के माध्यम से लगाए गए स्टॉल में जुराब, दस्ताने, शॉल और टोपी उपलब्ध थे। अटल टनल के खुलने के बाद लाहौल घाटी पहुंचना आसान होने से पर्यटन भी बढ़ा है और पर्यटक ठंड से बचने के लिए इन उत्पादों की खरीदारी कर रहे हैं। ग्रामीण महिलाएं स्वयं सहायता समूह के जरिए इन उत्पादों को बेच रही हैं, जिससे उन्हें आर्थिक लाभ मिल रहा है।
लाहौल-स्पीति शीत मरुस्थल के लिए प्रसिद्ध है। अटल टनल बनने से पहले यहाँ पहुँचने के लिए रोहतांग दर्रा पार करना पड़ता था, जो सर्दियों में भारी बर्फबारी के कारण बंद हो जाता था। ऐसे समय में हेलीकॉप्टर के जरिए ही आवागमन संभव था। ग्रामीण महिलाएं इस समय में जुराब और दस्ताने बुनकर पारंपरिक अवसरों जैसे फागली त्योहार, शादियों और अन्य समारोहों में आदान-प्रदान करती थीं।सेव संस्था की पहल से साल 2021 में इन जुराब और दस्तानों को जीआई टैग मिला। अब कई स्वयं सहायता समूह इन उत्पादों को बाजार में उपलब्ध करा रहे हैं।
ढालपुर में स्टॉल चला रहे कृष्ण कुमार नेगी का कहना है, “पहले लोग जुराबें अपने लिए ही बनाते थे, लेकिन अब सैलानियों में भी इसकी मांग बढ़ रही है। जुराब की कीमत उसके धागे और डिज़ाइन पर निर्भर करती है। मध्यम वर्ग की जुराब 400-500 रुपये में मिलती है, जबकि अच्छी ऊन की जुराब 1000-1500 रुपये तक की होती है। नाबार्ड के माध्यम से महिलाओं को सीधे अपने उत्पाद बेचने का अवसर मिल रहा है, जिससे ग्रामीण क्षेत्र की महिलाएं आर्थिक रूप से सशक्त हो रही हैं।