Summer Express, नई दिल्ली | देश की सर्वोच्च अदालत में लंबित मामलों का बोझ लगातार बढ़ता जा रहा है। कानून मंत्रालय द्वारा जारी आंकड़ों के अनुसार, सुप्रीम कोर्ट में इस समय 3,500 से अधिक जनहित याचिकाएं (PIL) लंबित हैं, जिनमें से बड़ी संख्या कई वर्षों से फैसले का इंतजार कर रही है।
रिपोर्ट के मुताबिक, कुल 3,525 जनहित याचिकाएं अब भी लंबित हैं। इनमें से 698 याचिकाएं ऐसी हैं जो 10 साल से अधिक समय से विचाराधीन हैं, जबकि सबसे पुराना मामला करीब 42 वर्षों से लंबित पड़ा है। यह स्थिति न्यायिक प्रक्रिया की धीमी गति और बढ़ते मामलों की ओर इशारा करती है।
अधिकांश लंबित जनहित याचिकाएं पर्यावरण, भूमि से जुड़े कानूनों और कृषि किरायेदारी जैसे मुद्दों से संबंधित हैं। कई मामलों में तो याचिकाकर्ताओं का निधन भी हो चुका है, लेकिन उनके केस अब भी अदालत में लंबित हैं।
कानून मंत्रालय के अनुसार, सुप्रीम कोर्ट में कुल लंबित मामलों की संख्या 80,000 के आंकड़े को पार कर चुकी है। पिछले पांच वर्षों में 1,872 जनहित याचिकाओं का निपटारा किया गया, लेकिन इसके बावजूद लंबित मामलों का बोझ कम नहीं हो पाया है।
कानून मंत्री अर्जुन राम मेघवाल ने हाल ही में लोकसभा में जानकारी दी कि 2014 के बाद से दायर जनहित याचिकाओं की संख्या में तेजी आई है। खासतौर पर वर्ष 2025 में सबसे अधिक 570 याचिकाएं दायर की गईं, जबकि 2019, 2020 और 2026 में भी बड़ी संख्या में याचिकाएं दाखिल हुई हैं।
सबसे पुराने मामलों में 1984 और 1985 में दायर याचिकाएं शामिल हैं, जो अब तक लंबित हैं। इनमें से कई मामले पर्यावरण और शहरी कानूनों से जुड़े हैं। इसके अलावा, अदालत की अवमानना से संबंधित कुछ याचिकाएं 1995 और 1996 से विचाराधीन हैं।
इन आंकड़ों से साफ है कि सुप्रीम कोर्ट में लंबित मामलों का बैकलॉग एक गंभीर चुनौती बना हुआ है, जिसके समाधान के लिए प्रभावी कदम उठाने की जरूरत है।