मोनिका रावत , चंडीगढ़ | पंजाब एवं हरियाणा हाई कोर्ट ने 34 वर्ष पुराने पैतृक कृषि भूमि विवाद का निपटारा करते हुए एक महत्वपूर्ण फैसला सुनाया है। अदालत ने स्पष्ट किया कि यदि कोई पुरुष और महिला लंबे समय तक पति-पत्नी की तरह साथ रहते हैं तो कानून उनके विवाह की धारणा स्वीकार करता है। ऐसे में उस महिला के पक्ष में की गई वसीयत को केवल इस आधार पर अमान्य नहीं ठहराया जा सकता कि विवाह या करेवा विवाह को लेकर विवाद है अथवा वह मृतक की रक्त संबंधी उत्तराधिकारी नहीं है। अदालत ने यह भी कहा कि किसी संतानहीन व्यक्ति को उसकी सेवा करने वाले व्यक्ति के पक्ष में अपनी संपत्ति की वसीयत करने का पूरा अधिकार है।
जस्टिस हरकेश मनुजा ने सुरमुख सिंह व अन्य की नियमित द्वितीय अपील खारिज करते हुए जगाधरी की निचली अदालतों के फैसलों को बरकरार रखा।
मामला यमुनानगर जिले के गांव सांखेड़ा स्थित 23 बीघा 19 बिस्वा कृषि भूमि से जुड़ा था। वादकारियों का दावा था कि यह भूमि बिशन सिंह की पैतृक संपत्ति थी। उनका कहना था कि बिशन सिंह जाट समुदाय से थे और प्रचलित रीति-रिवाजों के अनुसार पैतृक संपत्ति अपनी कथित पत्नी देबो के नाम वसीयत नहीं कर सकते थे। उन्होंने यह भी दलील दी कि देबो उनकी कानूनी पत्नी नहीं थी, इसलिए उनके पक्ष में की गई वसीयत और सहमति डिक्री दोनों अवैध हैं।
हाई कोर्ट ने रिकार्ड का विस्तृत परीक्षण करते हुए पाया कि 15 मार्च 1976 की पंजीकृत वसीयत भारतीय उत्तराधिकार अधिनियम और भारतीय साक्ष्य अधिनियम के प्रावधानों के अनुरूप सिद्ध की गई। वसीयत के गवाह ने अदालत में इसकी विधिवत तामील की पुष्टि की और दस्तावेज पर नोटरी का प्रमाणीकरण भी मौजूद था। अदालत ने स्पष्ट टिप्पणी की, संदेह वास्तविक और ठोस होना चाहिए, काल्पनिक नहीं।
पीठ ने यह भी पाया कि वर्ष 1978 की सहमति डिक्री में स्वयं बिशन सिंह ने देबो को अपनी पत्नी के रूप में स्वीकार किया था। उन्होंने अपने जीवनकाल में उस डिक्री को कभी चुनौती नहीं दी। इसके अलावा साक्ष्यों से यह भी स्थापित हुआ कि देबो लंबे समय तक बिशन सिंह के साथ रहती थीं और उनकी सेवा करती थीं। पैतृक संपत्ति के मुद्दे पर हाई कोर्ट ने कहा कि भले ही भूमि को पैतृक मान लिया जाए, फिर भी संतानहीन व्यक्ति अपनी सेवा करने वाले व्यक्ति के पक्ष में संपत्ति का प्रबंध कर सकता है। वादकारी यह साबित नहीं कर सके कि कोई ऐसा बाध्यकारी प्रचलित रिवाज था जो इस प्रकार की वसीयत पर पूर्ण प्रतिबंध लगाता हो।
अदालत ने वादकारियों के आचरण पर भी टिप्पणी करते हुए कहा कि पूर्व की न्यायिक कार्यवाही में उन्होंने स्वयं देबो के अधिकारों को स्वीकार किया था, जबकि बाद में उसी अधिकार को चुनौती देने लगे। अदालत ने कहा कि कोई पक्ष एक ही मामले में अलग-अलग अवसरों पर परस्पर विरोधी रुख नहीं अपना सकता। इन सभी तथ्यों और कानूनी सिद्धांतों के आधार पर हाई कोर्ट ने निचली अदालतों के फैसलों को सही ठहराते हुए अपील खारिज कर दी।