समर न्यूज | चंडीगढ़
ऑपरेशन ब्लू स्टार के दौरान अमृतसर में दुकानें गंवाने वाले 133 प्रभावित लोगों को 42 साल बाद बड़ी राहत मिली है। पंजाब एवं हरियाणा हाईकोर्ट ने पंजाब सरकार को इन पीड़ितों को 1,000 रुपये प्रति वर्ग गज की दर से वैकल्पिक बूथ या जगह आवंटित करने का निर्देश दिया है।
अदालत ने कहा कि प्रभावित लोगों के साथ गलीआरा योजना के लाभार्थियों की तुलना में अलग व्यवहार करने का कोई उचित आधार नहीं है। न्यायमूर्ति जसगुरप्रीत सिंह पुरी और न्यायमूर्ति प्रवीणदर सिंह चौहान की खंडपीठ ने कहा कि विस्थापित लोगों को उनके कारोबार से हटे चार दशक से अधिक समय बीत चुका है। अदालत ने माना कि इतनी लंबी देरी से उनके मौलिक अधिकार प्रभावित हुए हैं। पीठ ने सरकार की कार्रवाई को प्रथम दृष्टया अनुचित, भेदभावपूर्ण और मनमाना बताया। मामला 2017 में सुप्रीम कोर्ट से हाईकोर्ट को वापस भेजा गया था, ताकि वैकल्पिक जगह आवंटित करने की उचित दर तय की जा सके।
पुरानी नीति लागू करने का आदेश
अदालत ने कहा कि 1988 की गलीआरा योजना के तहत विस्थापित दुकानदारों को 1,000 रुपये प्रति वर्ग गज की दर से जगह दी गई थी और उन्हें अन्य सुविधाएं भी मिली थीं। 1991 और 2006 में पंजाब सरकार की बैठकों में ऑपरेशन ब्लू स्टार से प्रभावित लोगों के पुनर्वास के लिए भी इसी नीति को अपनाने का निर्णय हुआ था। इसके बावजूद 2012 में सरकार ने 133 बूथों के लिए तत्कालीन कलेक्टर दर 38,400 रुपये प्रति वर्ग गज तय कर दी थी। हाईकोर्ट ने अब सभी संबंधित लाभ गलीआरा योजना के अनुरूप देने का आदेश दिया है। पीठ ने कहा कि राज्य का दायित्व था कि विस्थापित लोगों के पुनर्वास की प्रक्रिया समय पर पूरी की जाती। अदालत ने न्याय के सिद्धांत का उल्लेख करते हुए कहा कि इतने लंबे समय तक मुकदमे को खिंचते रहना उचित नहीं है।
हाईकोर्ट के आदेश में पांच अन्य प्रभावितों को भी राहत
राहत केवल पहले से सूचीबद्ध 133 लोगों तक सीमित नहीं रहेगी। अदालत ने उन पांच पात्र प्रभावितों को भी वैकल्पिक जगह देने का निर्देश दिया है, जिन्हें पहले निर्धारित स्थल पर जगह उपलब्ध नहीं होने के कारण शामिल नहीं किया गया था। अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि जिन 18 लोगों ने पहले ही 38,400 रुपये प्रति वर्ग गज की दर से पूरी राशि जमा कर दी है, उनके मामलों को नहीं बदला जाएगा। वहीं, जिन लोगों ने सुप्रीम कोर्ट के अंतरिम आदेश के तहत 10,000 रुपये प्रति वर्ग गज जमा किए थे, उनकी रकम नई लागत में समायोजित होगी और अतिरिक्त राशि होने पर वापस की जाएगी। आवंटन, कब्जा और अन्य औपचारिकताएं दो महीने में पूरी करने का निर्देश दिया गया है।