मोनिका रावत, चंडीगढ़ | हरियाणा में सरकारी विभागों के बैंक खातों से कथित सरकारी धन के गबन और अनधिकृत हस्तांतरण से जुड़े बहुचर्चित मामले में गिरफ्तार आईएएस अधिकारी प्रदीप कुमार ने अपनी गिरफ्तारी, पुलिस रिमांड और न्यायिक हिरासत को पंजाब एवं हरियाणा हाई कोर्ट में चुनौती दी है। याचिका में आरोप लगाया गया है कि केंद्रीय अन्वेषण ब्यूरो (सीबीआई) ने गिरफ्तारी के समय और उसके बाद भी उन्हें लिखित रूप से गिरफ्तारी के आधार नहीं बताए। इसे मौलिक अधिकारों का उल्लंघन बताते हुए गिरफ्तारी, रिमांड आदेशों और उसके बाद की पूरी कार्यवाही को अवैध घोषित कर तत्काल रिहाई का निर्देश देने की मांग की गई है।
याचिका के अनुसार, इस मामले में सबसे पहले 23 फरवरी 2026 को हरियाणा भ्रष्टाचार निरोधक ब्यूरो ने सरकारी विभागों के आईडीएफसी फर्स्ट बैंक खातों से सरकारी धन के कथित गबन के आरोप में एफआईआर दर्ज की थी। बाद में 8 अप्रैल 2026 को जांच सीबीआई को सौंप दी गई। इसके बाद सीबीआई ने भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम और भारतीय न्याय संहिता की विभिन्न धाराओं के तहत नया मामला दर्ज कर जांच शुरू की।
याचिकाकर्ता का कहना है कि सीबीआई के नोटिस मिलने पर वह 15 मई और 24 जून 2026 को स्वयं जांच में शामिल हुए और जांच एजेंसी को पूरा सहयोग दिया। इसके बावजूद 30 जून 2026 को हरियाणा के नरवाना टोल प्लाजा से दोपहर करीब 2:50 बजे उन्हें हिरासत में ले लिया गया, लेकिन उस समय गिरफ्तारी के आधार नहीं बताए गए।
याचिका में यह भी दावा किया गया है कि सीबीआई के विभिन्न दस्तावेजों में गिरफ्तारी का समय अलग-अलग दर्ज है। पत्नी को भेजी गई सूचना में गिरफ्तारी का समय शाम 4:25 बजे दर्शाया गया है, जबकि गिरफ्तारी मेमो में शाम 6:25 बजे का समय अंकित है। याचिकाकर्ता का कहना है कि इन विरोधाभासी अभिलेखों से स्पष्ट होता है कि वास्तविक हिरासत और औपचारिक गिरफ्तारी के बीच कई घंटे तक उन्हें बिना वैधानिक प्रक्रिया अपनाए रखा गया।
याचिका के अनुसार, 30 जून को पंचकूला की अदालत में पुलिस रिमांड की सुनवाई के दौरान भी गिरफ्तारी के आधार उपलब्ध नहीं कराए गए। बचाव पक्ष की आपत्ति के बाद पहली बार अधिवक्ता को कथित गिरफ्तारी के आधार उपलब्ध कराए गए, लेकिन उन पर याचिकाकर्ता के हस्ताक्षर नहीं थे। इसके बावजूद अदालत ने सीबीआई की दलील स्वीकार करते हुए समय संबंधी विसंगति को टंकण त्रुटि मानकर पुलिस रिमांड दे दी। बाद में 2 जुलाई 2026 को उन्हें न्यायिक हिरासत में भेज दिया गया।याचिकाकर्ता ने हाई कोर्ट से सुप्रीम कोर्ट के कई फैसलों का हवाला देते हुए कहा है कि गिरफ्तारी के आधार लिखित रूप में न बताना संवैधानिक और वैधानिक अनिवार्यता का उल्लंघन है। इसलिए 30 जून की गिरफ्तारी, 30 जून और 2 जुलाई के रिमांड आदेशों सहित उसके बाद की पूरी कार्यवाही को निरस्त कर उन्हें तत्काल रिहा करने के निर्देश जारी किए जाएं। हाई कोर्ट ने याचिका पर सुनवाई करते हुए सीबीआई से जवाब तलब करते हुए मामले की सुनवाई 15 सितम्बर तक स्थगित कर दी।
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